भगवद् गीता वर्ल्ड

गीता के उपदेश

भगवद् गीता के प्रसिद्ध श्लोक, उनका अर्थ और जीवन के लिए सीख।

  • कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं – तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।
  • आत्मा न जन्मती है, न मरती है – आत्मा का न कभी जन्म होता है, न मृत्यु। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
  • जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलता है – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
  • शस्त्र आत्मा को काट नहीं सकते – आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
  • सुख-दुःख आते-जाते हैं, उन्हें सहन करो – इंद्रियों और विषयों के संयोग से सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख होते हैं। वे आते-जाते हैं और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत, उन्हें सहन करो।
  • समत्व ही योग है – हे धनंजय, आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समता योग कहलाती है।
  • योगः कर्मसु कौशलम् – समबुद्धि से युक्त मनुष्य इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों से मुक्त हो जाता है। इसलिए योग में लग जाओ; कर्मों में कुशलता ही योग है।
  • स्थितप्रज्ञ के लक्षण – जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जिसे सुख की लालसा नहीं रहती और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
  • क्रोध से विनाश की सीढ़ी – क्रोध से मोह (भ्रम) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।
  • नियत कर्म करो – तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारी शरीर-यात्रा भी नहीं चल सकेगी।
  • श्रेष्ठ जन जैसा करते हैं, लोग वैसा करते हैं – श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
  • अपना धर्म श्रेष्ठ है – अच्छी तरह आचरण किए गए दूसरे के धर्म से गुणरहित होने पर भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
  • यदा यदा हि धर्मस्य – हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
  • परित्राणाय साधूनाम् – साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
  • ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं – इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है।
  • श्रद्धावान को ज्ञान मिलता है – श्रद्धावान, तत्पर और इंद्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है, और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।
  • ज्ञानी की समदृष्टि – ज्ञानीजन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।
  • अपना उद्धार स्वयं करो – मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, अपना पतन नहीं होने देना चाहिए। मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु।
  • संतुलित जीवन ही योग है – जिसका आहार-विहार उचित है, जिसके कर्म संयमित हैं और जिसका सोना-जागना नियमित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
  • अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है – हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और कठिनाई से वश में होता है, परंतु हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
  • सब कुछ मुझमें पिरोया है, जैसे धागे में मणियाँ – हे धनंजय, मुझसे परे कुछ भी नहीं है। यह सारा जगत मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ।
  • योगक्षेमं वहाम्यहम् – जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त भक्तों का योगक्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।
  • पत्रं पुष्पं फलं तोयम् – जो कोई भक्त प्रेम से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त की प्रेमपूर्वक दी हुई भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।
  • मन्मना भव मद्भक्तः – मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार स्वयं को मुझमें लगाकर, मुझे परम लक्ष्य मानकर तुम मुझे ही प्राप्त होगे।
  • मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ – हे गुडाकेश, मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ, और मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत भी हूँ।
  • कालोऽस्मि — मैं काल हूँ – मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय लोकों का संहार करने में लगा हूँ। तुम्हारे बिना भी विपक्ष में खड़े ये योद्धा नहीं बचेंगे।
  • भगवान को प्रिय भक्त – जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है — वह भक्त मुझे प्रिय है (12.13–14)।
  • जीव मेरा ही सनातन अंश है – इस जीव-लोक में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन और पाँच इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है।
  • नरक के तीन द्वार — काम, क्रोध, लोभ – काम, क्रोध और लोभ — ये तीन आत्मा का नाश करने वाले नरक के द्वार हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।
  • वाणी का तप – जो वाणी किसी को उद्वेग न दे, सत्य हो, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय (शास्त्र-पाठ) का अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।
  • सर्वधर्मान्परित्यज्य — मेरी शरण में आओ – सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
  • जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, वहाँ विजय है – संजय कहते हैं — जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है, ऐसा मेरा मत है।