कालोऽस्मि — मैं काल हूँ
मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय लोकों का संहार करने में लगा हूँ। तुम्हारे बिना भी विपक्ष में खड़े ये योद्धा नहीं बचेंगे।
श्रीभगवानुवाच ।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
śrībhagavānuvāca .
kālo.asmi lokakṣayakṛtpravṛddho lokānsamāhartumiha pravṛttaḥ .
ṛte.api tvāṃ na bhaviṣyanti sarve ye.avasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 11.32
विश्वरूप दर्शन के समय भगवान स्वयं को काल के रूप में प्रकट करते हैं। इससे अर्जुन समझते हैं कि वे केवल निमित्त हैं; सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हो रहा है।
जीवन-सूत्र: समय सबसे बड़ा शिक्षक है; उसे व्यर्थ न जाने दें।
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