आरती, भजन और स्तुति
पारंपरिक आरतियाँ, स्तोत्र और स्तुतियाँ — मूल पाठ और उनके अर्थ सहित।
- आरती कुंजबिहारी की – श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की सबसे लोकप्रिय पारंपरिक आरती, जो जन्माष्टमी और प्रतिदिन संध्या को गाई जाती है।
- ॐ जय जगदीश हरे – भगवान विष्णु (हरि) की वह आरती जो लगभग हर घर और मंदिर में गाई जाती है; 19वीं सदी में पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित।
- मधुराष्टकम् – श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र — "मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्", मधुरता के स्वामी का सब कुछ मधुर है।
- अच्युतं केशवं (अच्युताष्टकम्) – आदि शंकराचार्य को समर्पित अच्युताष्टकम् के प्रसिद्ध श्लोक, जिनमें श्रीकृष्ण और श्रीराम के नामों का मधुर संगम है।
- गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् – संत बिल्वमंगल (लीलाशुक) की प्रसिद्ध रचना, जिसका हर श्लोक "गोविन्द दामोदर माधवेति" पर समाप्त होता है।
- श्रीकृष्णाष्टकम् (भजे व्रजैकमण्डनम्) – आदि शंकराचार्य को समर्पित श्रीकृष्णाष्टकम् के प्रारंभिक श्लोक — व्रज के एकमात्र आभूषण नंदनंदन की वंदना।
- कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् – गीता-पाठ से पहले बोला जाने वाला प्रसिद्ध वंदना-श्लोक — मैं जगद्गुरु श्रीकृष्ण को प्रणाम करता हूँ।
- वैष्णव जन तो तेने कहिए – गुजरात के आदि-कवि भक्त नरसिंह मेहता (15वीं सदी) का अमर भजन, जो सच्चे वैष्णव (भगवद्-भक्त) के गुण बताता है।
- श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी (धुन) – सरल पारंपरिक नाम-धुन, जिसे सत्संग और कीर्तन में सब मिलकर गाते हैं।
- हरे कृष्ण कीर्तन – महामंत्र का सामूहिक संकीर्तन — श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा फैलाई गई नाम-संकीर्तन की परंपरा।
- गोपाला गोपाला देवकीनंदन गोपाला (धुन) – बाल-गोपाल के नामों की सरल पारंपरिक धुन, जो सत्संग और भजन-संध्या में गाई जाती है।
- पायो जी मैंने राम रतन धन पायो (मीराबाई) – मीराबाई (16वीं सदी) का प्रसिद्ध पद — सद्गुरु की कृपा से मिला हरिनाम ही सबसे अनमोल धन है।
- मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई (मीराबाई) – मीराबाई का अमर पद — "मेरे तो केवल गिरिधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।" अनन्य भक्ति का सबसे सुंदर उदाहरण।
- मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो (सूरदास) – सूरदास (16वीं सदी) का प्रसिद्ध वात्सल्य पद — माखन चुराकर पकड़े गए नन्हे कान्हा की मीठी सफ़ाई।
- गीत गोविंद — दशावतार स्तोत्र (जयदेव) – कवि जयदेव (12वीं सदी) के गीत गोविंद का प्रथम अष्टपदी — "केशव धृत... जय जगदीश हरे", दस अवतारों की वंदना।