भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 66

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja .
ahaṃ tvāṃ sarvapāpebhyo mokṣyayiṣyāmi mā śucaḥ ॥

अर्थ

सब धर्मों को छोड़कर तुम केवल एक मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा — तुम शोक मत करो

शब्दार्थ

  • सर्वधर्मान् – सब धर्मों को — सभी कर्तव्यों और साधनों (के आश्रय) को
  • परित्यज्य – पूर्णतः त्यागकर
  • माम् – मुझ
  • एकम् – एक (अद्वितीय) की ही
  • शरणम् – शरण में, आश्रय रूप में
  • व्रज – जाओ, आओ
  • अहम् – मैं
  • त्वा – तुम्हें
  • सर्वपापेभ्यः – सब पापों से
  • मोक्षयिष्यामि – मुक्त कर दूँगा
  • मा शुचः – शोक मत करो

अन्वय

सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज; अहं त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि; मा शुचः ।

व्याख्या

यह श्लोक गीता का ‘चरम श्लोक’ कहलाता है — अन्तिम और सर्वोच्च उपदेश। इसे भगवान ने स्वयं ‘सर्वगुह्यतम’ — सब रहस्यों में सबसे गहरा रहस्य — कहा (18.64)। सत्रह अध्यायों और इस अध्याय के 65 श्लोकों में दिया गया सम्पूर्ण उपदेश इसी एक वाक्य में सिमट आता है। सदियों से भारत के सन्तों, आचार्यों और भक्तों ने इस श्लोक को जीवन का आधार बनाया है। इसके चार भाग हैं, और प्रत्येक पर गहराई से विचार करना आवश्यक है।

पहला भाग है ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ — सब धर्मों को छोड़कर। यह गीता का सबसे अधिक चर्चित और व्याख्यायित वाक्यांश है। क्या भगवान, जिन्होंने पूरी गीता में स्वधर्म-पालन पर बल दिया (18.47), अब धर्म छोड़ने को कह रहे हैं? स्पष्ट है कि इसका अर्थ कर्तव्यों का बाहरी त्याग नहीं हो सकता, क्योंकि इस उपदेश के तुरन्त बाद अर्जुन ने ‘करिष्ये वचनं तव’ (18.73) कहकर युद्ध — अपना स्वधर्म — ही किया। अतः यहाँ ‘त्याग’ का अर्थ कुछ और सूक्ष्म है। ‘परित्यज्य’ में ‘परि’ उपसर्ग पूर्णता बताता है — पूरी तरह छोड़ना — पर क्या छोड़ना, इस पर आचार्यों के मत भिन्न हैं।

शंकराचार्य के अनुसार ‘सर्वधर्म’ में धर्म और अधर्म दोनों आते हैं — सभी कर्म, क्योंकि कर्म मात्र बन्धन के क्षेत्र में है। उनके मत में यहाँ सर्वकर्म-संन्यास का उपदेश है: आत्मज्ञानी सब कर्मों को छोड़कर उस अद्वितीय परमेश्वर की शरण लेता है, जो सबकी आत्मा है। ‘मामेकम्’ का अर्थ है वह एक, अद्वितीय आत्मा, जो सब भूतों में स्थित है, जिसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। उनके अनुसार यह जानना कि ‘मैं वही अद्वितीय ईश्वर हूँ, मुझसे भिन्न कुछ नहीं’ — यही शरणागति है, और इसी ज्ञान से मोक्ष होता है। वे स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष का साधन केवल ज्ञान है, कर्म नहीं; और कर्म तथा ज्ञान का समुच्चय सम्भव नहीं।

रामानुजाचार्य इस श्लोक की दो व्याख्याएँ देते हैं, और श्रीवैष्णव परम्परा ने इसे ‘चरम श्लोक’ के रूप में अपने प्रपत्ति-सिद्धान्त का आधार बनाया। पहली व्याख्या में ‘सर्वधर्मों का त्याग’ का अर्थ है कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग रूपी सब धर्मों को करते हुए भी उनके फल, आसक्ति और कर्तृत्व का त्याग, और यह भाव त्याग देना कि ये साधन स्वयं मुझे मोक्ष देंगे — अर्थात् केवल भगवान को ही उपाय (साधन) मानना। दूसरी व्याख्या उनके लिए है जो भक्ति-योग के कठिन अंगों या पूर्व पापों के प्रायश्चित्तों के बोझ से निराश हैं: भगवान कहते हैं कि उन सब कठिन साधनों के स्थान पर, केवल मेरी शरण ग्रहण करो — शरणागति (प्रपत्ति) स्वयं ही पर्याप्त साधन है, और मैं तुम्हें भक्ति के मार्ग में बाधक सब पापों से मुक्त कर दूँगा।

मध्वाचार्य के अनुसार ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ का अर्थ धर्मों का स्वरूपतः त्याग नहीं, बल्कि उनके फलों और उन पर निर्भरता का त्याग है। वे कहते हैं कि कोई भी कर्तव्य छोड़ा नहीं जाना चाहिए; भक्त सब धर्मों का पालन करता है, पर उनके आश्रय को छोड़कर एकमात्र भगवान विष्णु को ही सर्वोच्च, स्वतन्त्र आश्रय मानता है। कुछ अन्य वैष्णव आचार्य इसे सब धर्मों से ऊपर शुद्ध भक्ति की श्रेष्ठता के रूप में भी समझते हैं। इन सब व्याख्याओं में एक सूत्र समान है: अन्तिम भरोसा किसी साधन पर नहीं, परमात्मा पर होना चाहिए।

दूसरा भाग है ‘मामेकं शरणं व्रज’ — केवल एक मेरी शरण में आओ। यहाँ ‘एकम्’ शब्द निर्णायक है — केवल मैं, कोई दूसरा नहीं; अनन्य शरणागति। 18.62 में भगवान ने ‘तमेव’ — उस ईश्वर की — शरण लेने को कहा था; अब वे स्वयं को प्रकट करके कहते हैं ‘माम्’ — मेरी। अर्जुन के सामने रथ पर बैठा सारथी ही हृदय में बैठा परमेश्वर है। ‘व्रज’ — जाओ — यह क्रियापद सक्रिय निर्णय का सूचक है; शरणागति निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक सचेत, सम्पूर्ण आत्मसमर्पण का कदम है। परम्परा में शरणागति के छह अंग बताए गए हैं: अनुकूल का संकल्प, प्रतिकूल का त्याग, ‘वे रक्षा करेंगे’ यह दृढ़ विश्वास, रक्षक के रूप में उनका वरण, आत्म-निक्षेप (स्वयं को सौंप देना), और दीनता।

तीसरा भाग है भगवान की प्रतिज्ञा — ‘अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि’ — मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा। यहाँ ‘अहम्’ पर बल है — मैं स्वयं, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, परम दयालु। अर्जुन का सबसे बड़ा भय था पाप — पहले अध्याय (1.36, 1.45) में उसने बार-बार कहा था कि स्वजनों को मारकर हम पाप के भागी होंगे। भगवान अब उसी भय का सीधा उत्तर देते हैं: पाप का भार तुम्हें नहीं उठाना; मैं उठाऊँगा। ‘सर्वपापेभ्यः’ — सब पापों से — इसमें भूतकाल के संचित पाप, वर्तमान के पाप, और वे सब बन्धन आते हैं जो मोक्ष में बाधक हैं। शंकराचार्य के अनुसार ये धर्म-अधर्म रूपी सभी बन्धन हैं; रामानुजाचार्य के अनुसार भगवत्प्राप्ति के विरोधी सब पाप।

चौथा भाग है ‘मा शुचः’ — शोक मत करो। यह गीता का अन्तिम आश्वासन है, और यह गीता के आरम्भ से सुन्दर रूप से जुड़ता है। दूसरे अध्याय (2.11) में भगवान का पहला उपदेश था — ‘अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्’ — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं। और अब अन्तिम उपदेश है — ‘मा शुचः’ — शोक मत करो। गीता शोक से आरम्भ होती है और शोक-निवृत्ति पर पूर्ण होती है। बीच का सारा उपदेश अर्जुन के — और हम सबके — शोक को मिटाने के लिए ही है।

इस श्लोक का व्यावहारिक अर्थ गहरा है। हम जीवन में अपने साधनों, योजनाओं, उपलब्धियों और पुण्यों पर भरोसा करते हैं, और जब वे विफल होते हैं, तो चिन्ता और भय में डूब जाते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करें, पर अन्तिम भरोसा केवल परमात्मा पर रखें। अपने भूतकाल की भूलों के बोझ से दबे लोगों के लिए यह सबसे बड़ा आश्वासन है — कोई भी पाप इतना बड़ा नहीं कि ईश्वर की शरण उसे मिटा न सके। यह आलस्य या अधर्म की छूट नहीं — सच्चा शरणागत कभी अधर्म नहीं करता — बल्कि भय, अपराध-बोध और चिन्ता से मुक्ति का द्वार है। जो पूरे हृदय से उनकी शरण ले लेता है, उसके जीवन की बागडोर वे स्वयं सँभाल लेते हैं।

प्रसंग

पिछले श्लोक में भगवान ने अनन्य भक्ति के चार अंग बताकर सत्य प्रतिज्ञा की। यह श्लोक उस ‘सर्वगुह्यतम’ वचन की पराकाष्ठा है — गीता का चरम उपदेश, पूर्ण शरणागति। यह 18.62 के ‘तमेव शरणं गच्छ’ का प्रत्यक्ष रूप है और 2.11 के पहले उपदेश ‘अशोच्यान्’ से ‘मा शुचः’ तक की यात्रा को पूरा करता है। अगले श्लोक (18.67) से भगवान बताते हैं कि यह गीता-ज्ञान किसे देना चाहिए और किसे नहीं।

जीवन-शिक्षा

अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करें, पर अन्तिम भरोसा अपने साधनों पर नहीं, परमात्मा पर रखें। भूतकाल की भूलों और अपराध-बोध के बोझ को उनकी शरण में सौंप दें — कोई भी भूल उनकी कृपा से बड़ी नहीं। चिन्ता और शोक छोड़ें; जो पूरे हृदय से उनकी शरण लेता है, उसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी वे स्वयं लेते हैं।

मुख्य शब्द

चरम श्लोक
गीता का अन्तिम और सर्वोच्च उपदेश — पूर्ण शरणागति
सर्वधर्म-परित्याग
सब साधनों पर निर्भरता का त्याग (शंकर: सर्वकर्म-संन्यास; रामानुज: फल-कर्तृत्व त्याग या प्रपत्ति; मध्व: फलासक्ति त्याग)
शरणागति / प्रपत्ति
परमात्मा को एकमात्र रक्षक और उपाय मानकर पूर्ण आत्मसमर्पण
मामेकम्
केवल एक मैं — अनन्य आश्रय
सर्वपाप
मोक्ष में बाधक सब पाप और बन्धन
मा शुचः
शोक मत करो — गीता का अन्तिम आश्वासन

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