भगवद् गीता वर्ल्ड

भगवद् गीता अध्याय 2 – सांख्ययोग

गीता का सार — आत्मा की अमरता और कर्मयोग का परिचय।

72 श्लोक

इस अध्याय के सभी श्लोक

  1. 2.1 – सञ्जय उवाच – संजय ने कहा — इस प्रकार करुणा से घिरे हुए, आँसुओं से भरे और व्याकुल नेत्रों वाले, शोक में डूबे हुए उस अर्जुन…
  2. 2.2 – श्रीभगवानुवाच – श्रीभगवान ने कहा — हे अर्जुन! इस संकट की घड़ी में तुम्हें यह मोह कहाँ से आ घेरा?
  3. 2.3 – क्लैब्यं मा स्म गमः – हे पार्थ! नपुंसकता (कायरता) को प्राप्त मत हो; यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परन्तप!
  4. 2.4 – अर्जुन उवाच – अर्जुन ने कहा — हे मधुसूदन! हे शत्रुओं का संहार करने वाले!
  5. 2.5 – गुरूनहत्वा हि महानुभावान् – इन महानुभाव गुरुजनों को मारने की अपेक्षा इस संसार में भिक्षा माँगकर जीना भी अधिक श्रेयस्कर है; क्योंकि…
  6. 2.6 – न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो – हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीत लें।
  7. 2.7 – कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः – कायरता के दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित हो गया है।
  8. 2.8 – न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् – पृथ्वी पर शत्रुरहित, धन-धान्य से समृद्ध राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी पाकर, मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो…
  9. 2.9 – सञ्जय उवाच – संजय ने कहा — हे शत्रुओं को तपाने वाले राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन ने इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण…
  10. 2.10 – तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत – हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! तब दोनों सेनाओं के बीच शोक करते हुए उस अर्जुन से भगवान हृषीकेश ने मानो मुस्कुराते हुए…
  11. 2.11 – श्रीभगवानुवाच – श्रीभगवान ने कहा — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और साथ ही विद्वानों जैसी बातें भी…
  12. 2.12 – न त्वेवाहं जातु नासं – ऐसा कभी नहीं था कि मैं न रहा होऊँ, या तुम न रहे हो, या ये राजा लोग न रहे हों; और ऐसा भी नहीं है कि इसके बाद…
  13. 2.13 – देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं – जैसे देहधारी आत्मा को इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होते हैं, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की…
  14. 2.14 – मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः – हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले हैं।
  15. 2.15 – यं हि न व्यथयन्त्येते – हे पुरुषश्रेष्ठ! सुख और दुःख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये (इन्द्रिय-विषय संयोग) व्याकुल नहीं करते…
  16. 2.16 – नासतो विद्यते भावो नाभावो – असत् (अनित्य) का अस्तित्व नहीं है और सत् (नित्य) का अभाव नहीं है।
  17. 2.17 – अविनाशि तु तद्विद्धि येन – उसे तुम अविनाशी जानो जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अविनाशी तत्त्व का विनाश करने में कोई भी समर्थ…
  18. 2.18 – अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः – इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (प्रमाणों से न जाना जा सकने वाले) देहधारी आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान कहे गए…
  19. 2.19 – य एनं वेत्ति हन्तारं – जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है — वे दोनों ही सत्य को नहीं जानते; क्योंकि यह…
  20. 2.20 – न जायते म्रियते वा – यह आत्मा न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है; यह न तो एक बार होकर फिर न होने वाला है।
  21. 2.21 – वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् – हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवा सकता है और…
  22. 2.22 – वासांसि जीर्णानि यथा विहाय – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही देहधारी आत्मा पुराने शरीरों…
  23. 2.23 – नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं – इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती
  24. 2.24 – अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च – यह आत्मा काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया भी नहीं जा सकता।
  25. 2.25 – अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते – यह आत्मा अव्यक्त (इन्द्रियों से अगोचर), अचिन्त्य (मन से न सोचा जा सकने वाला) और अविकारी (कभी न बदलने वाला)…
  26. 2.26 – अथ चैनं नित्यजातं नित्यं – और यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाला और सदा मरने वाला भी मानो, तब भी हे महाबाहो!
  27. 2.27 – जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं – क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर गया है उसका जन्म निश्चित है।
  28. 2.28 – अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत – हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अप्रकट) थे, बीच में व्यक्त (प्रकट) हैं और मृत्यु के बाद फिर…
  29. 2.29 – आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- – कोई इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है, कोई दूसरा इसका आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है, और कोई अन्य इसे…
  30. 2.30 – देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य – हे भारत! सबके शरीर में रहने वाला यह देही (आत्मा) सदा ही अवध्य है — इसे कभी मारा नहीं जा सकता।
  31. 2.31 – स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि – और अपने स्वधर्म को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध…
  32. 2.32 – यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् – हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुआ और स्वर्ग के खुले द्वार के समान ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही प्राप्त…
  33. 2.33 – अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं – किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगे
  34. 2.34 – अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति – और लोग भी तुम्हारी सदा रहने वाली अपकीर्ति का बखान करेंगे; और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी…
  35. 2.35 – भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः – महारथी योद्धा यह मानेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से हट गए; और जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित रहे हो…
  36. 2.36 – अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः – तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुम्हारे लिए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे।
  37. 2.37 – हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं – यदि तुम युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे, और यदि जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे।
  38. 2.38 – सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ – सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
  39. 2.39 – एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे – हे पार्थ! यह बुद्धि (ज्ञान) तुम्हें सांख्य के विषय में कही गई।
  40. 2.40 – नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते – इस (कर्मयोग के) मार्ग में किए गए आरम्भ का कभी नाश नहीं होता और इसमें उलटा फल (दोष) भी नहीं होता।
  41. 2.41 – व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन – हे कुरुनन्दन! इस (कर्मयोग के) मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है; किन्तु जिनका कोई निश्चय नहीं, उनकी…
  42. 2.42 – यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः – हे पार्थ! जो अविवेकी लोग वेदों के (कर्मकाण्ड-सम्बन्धी) वचनों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि ‘इसके…
  43. 2.43 – कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् – वे कामनाओं से भरे मन वाले और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाले लोग ऐसी वाणी बोलते हैं जो भोग और ऐश्वर्य की…
  44. 2.44 – भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् – जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं और उस (फूलों जैसी) वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है, उनकी…
  45. 2.45 – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन – हे अर्जुन! वेद (के कर्मकाण्ड भाग) तीनों गुणों के कार्यों का वर्णन करते हैं।
  46. 2.46 – यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके – चारों ओर जल से भरे विशाल जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे कुएँ का जितना प्रयोजन रह जाता है, ब्रह्म को जानने…
  47. 2.47 – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं।
  48. 2.48 – योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं – हे धनंजय! योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर, सफलता और असफलता में समान भाव रखते हुए कर्म करो।
  49. 2.49 – दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय – हे धनंजय! बुद्धियोग (समत्व-बुद्धि) की तुलना में सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी का है।
  50. 2.50 – बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते – समबुद्धि से युक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप — दोनों से मुक्त हो जाता है।
  51. 2.51 – कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं – समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्म से उत्पन्न होने वाले फल का त्याग करके, जन्म के बन्धन से मुक्त होकर उस पद को…
  52. 2.52 – यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति – जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पूरी तरह पार कर लेगी, तब तुम जो सुनने योग्य है और जो सुन चुके हो — उन…
  53. 2.53 – श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति – अनेक प्रकार के वचनों को सुनकर विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब समाधि (परमात्मा) में निश्चल और अचल होकर स्थिर हो…
  54. 2.54 – अर्जुन उवाच – अर्जुन ने कहा — हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरबुद्धि (स्थितप्रज्ञ) पुरुष के क्या लक्षण हैं?
  55. 2.55 – श्रीभगवानुवाच – श्रीभगवान ने कहा — हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उठने वाली सब कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपने आप से…
  56. 2.56 – दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः – दुःखों के आने पर जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों के प्रति जिसकी लालसा मिट गई है, और जो राग, भय तथा क्रोध…
  57. 2.57 – यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् – जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, और उन-उन शुभ या अशुभ (अनुकूल या प्रतिकूल) परिस्थितियों को पाकर न हर्षित होता है…
  58. 2.58 – यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव – और जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के…
  59. 2.59 – विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः – विषयों को ग्रहण न करने वाले (निराहारी) देहधारी मनुष्य से विषय तो दूर हो जाते हैं, परन्तु उनका रस (भीतरी…
  60. 2.60 – यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य – हे कुन्तीपुत्र! संयम के लिए प्रयत्न करते हुए विवेकी पुरुष के मन को भी ये मथ डालने वाली इन्द्रियाँ बलपूर्वक…
  61. 2.61 – तानि सर्वाणि संयम्य युक्त – उन सब इन्द्रियों को संयमित करके, साधक योगयुक्त होकर मुझे ही परम आश्रय मानकर (मत्पर होकर) बैठे; क्योंकि जिसकी…
  62. 2.62 – ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते – विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है; आसक्ति से कामना जन्म लेती है…
  63. 2.63 – क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः – क्रोध से सम्मोह (गहरी मूढ़ता) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति के नष्ट होने से…
  64. 2.64 – रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् – परन्तु जिसने अपने अन्तःकरण को वश में कर लिया है, वह राग-द्वेष से रहित और अपने वश में की हुई इन्द्रियों…
  65. 2.65 – प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते – उस प्रसाद (अन्तःकरण की निर्मलता) के प्राप्त होने पर उसके सब दुःखों का नाश हो जाता है; क्योंकि प्रसन्नचित्त…
  66. 2.66 – नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य – जो योगयुक्त (संयमी) नहीं है, उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती; और अयुक्त में भावना (आत्मा का ध्यान) भी नहीं होती।
  67. 2.67 – इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते – क्योंकि विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस (एक भी) इन्द्रिय के पीछे मन लग जाता है, वह (एक इन्द्रिय)…
  68. 2.68 – तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः – इसलिए हे महाबाहो! जिसकी इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से वश में (निगृहीत) कर ली गई हैं, उसकी…
  69. 2.69 – या निशा सर्वभूतानां तस्यां – जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को…
  70. 2.70 – आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं – जैसे सब ओर से जल से भरे हुए और अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (नदियों के) जल उसे विचलित किए बिना समा जाते…
  71. 2.71 – विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः – जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर, स्पृहा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है, वही शान्ति को प्राप्त…
  72. 2.72 – एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ – हे पार्थ! यही ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था) है।

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