आज का गीता श्लोक
अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām .
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat ॥
अर्थ
हे महाबाहु! यह (आठ प्रकार वाली) मेरी अपरा, अर्थात् निम्न प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी एक दूसरी, जीव-रूप परा (उच्च) प्रकृति को जानो, जिसके द्वारा यह संपूर्ण जगत् धारण किया जाता है
शब्दार्थ
- अपरा – निम्न, जड़
- इयम् – यह
- इतः – इससे
- तु – परन्तु
- अन्याम् – भिन्न, दूसरी
- प्रकृतिम् – प्रकृति को
- विद्धि – जानो
- मे – मेरी
- पराम् – परा, उच्च, चेतन
- जीवभूताम् – जीव-रूप
- महाबाहो – हे महाबाहु
- यया – जिसके द्वारा
- इदम् – यह
- धार्यते – धारण किया जाता है
- जगत् – जगत्
अन्वय
महाबाहो, इयम् अपरा; इतः तु अन्यां जीवभूतां मे परां प्रकृतिं विद्धि, यया इदं जगत् धार्यते ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में बताई गई आठ प्रकार की प्रकृति को भगवान् अब ‘अपरा’ — निम्न — कहते हैं। वह निम्न इसलिए है क्योंकि वह जड़ है, परिवर्तनशील है, और स्वयं में चेतना-रहित है। अब भगवान् अपनी दूसरी, उच्च शक्ति का वर्णन करते हैं — ‘परा प्रकृति’, जो ‘जीवभूता’ — जीव-रूप, चेतन — है।
यह परा प्रकृति सब जीवों में स्थित चेतना है — वह तत्त्व जो देखता, जानता, अनुभव करता है। अपरा प्रकृति शरीर और मन का निर्माण करती है, पर उन्हें जीवन और चेतना परा प्रकृति देती है। जैसे बिजली के बिना बल्ब, पंखा और मशीन सब निष्क्रिय पड़े रहते हैं, वैसे ही चेतना के बिना शरीर और मन निर्जीव हैं।
‘ययेदं धार्यते जगत्’ — इसी परा प्रकृति के द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है। आचार्य शंकर इसका अर्थ करते हैं कि यह क्षेत्रज्ञ-रूप प्रकृति है, जो जगत् के भीतर प्रविष्ट होकर उसे धारण करती है। आचार्य रामानुज कहते हैं कि जड़ प्रकृति भोग्य है और चेतन जीव भोक्ता; जीव जड़ जगत् को अपने कर्मों के लिए धारण और उपयोग करता है।
इस श्लोक का गहरा संदेश यह है कि जड़ और चेतन — दोनों भगवान् की ही शक्तियाँ हैं। हम सब जीव भगवान् की परा प्रकृति के अंश हैं; हमारा वास्तविक स्वरूप दिव्य है। आचार्यों में इस बात पर भिन्नता है कि जीव और ईश्वर का संबंध अंतिम रूप से अभिन्नता का है (शंकर) या अंश-अंशी का (रामानुज), या सदा भिन्नता का (मध्व), पर सब मानते हैं कि जीव भगवान् पर आश्रित है।
प्रसंग
7.4 में आठ तत्त्वों वाली अपरा प्रकृति बताई गई; यहाँ चेतन परा प्रकृति का वर्णन है। अगले श्लोक (7.6) में भगवान् कहते हैं कि सब प्राणी इन दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न हैं, और वे स्वयं संपूर्ण जगत् के उत्पत्ति और प्रलय के कारण हैं।
जीवन-शिक्षा
आप केवल शरीर और मन का संयोग नहीं, बल्कि दिव्य चेतना का अंश हैं। जब आप दूसरों को देखें, तो उनमें भी उसी दिव्य चेतना को पहचानें। यह दृष्टि आत्म-सम्मान और दूसरों के प्रति आदर दोनों बढ़ाती है।
मुख्य शब्द
- परा प्रकृति
- भगवान् की उच्च, चेतन प्रकृति
- जीवभूता
- जीव-रूप, चेतना-स्वरूप
- अपरा
- निम्न, जड़ प्रकृति
- धार्यते
- धारण किया जाता है, टिका हुआ है