स्थितप्रज्ञ के लक्षण
जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जिसे सुख की लालसा नहीं रहती और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ .
vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 2.56
अर्जुन ने पूछा था कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसा होता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि उसकी पहचान बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि भीतर की शांति है।
जीवन-सूत्र: प्रतिक्रिया देने से पहले एक क्षण रुकें; यही स्थिरता का आरंभ है।
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- Steady wisdom
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- 2.56
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