भगवद् गीता वर्ल्ड

योगक्षेमं वहाम्यहम्

जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त भक्तों का योगक्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate .
teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham ॥

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यह भक्तों के लिए गीता का सबसे मधुर वचन है। जो पूरे मन से भगवान पर निर्भर होता है, उसकी चिंता भगवान स्वयं करते हैं — जैसे माँ अपने शिशु की।

जीवन-सूत्र: अपना कर्तव्य करें और चिंता का भार भगवान को सौंप दें।

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Bhakti
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9.22
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