भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीकृष्ण के नाम

श्रीकृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम) और प्रमुख नामों के अर्थ व उनसे जुड़ी कथाएँ।

  • श्रीकृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली – भगवान श्रीकृष्ण के 108 पवित्र नाम, अर्थ सहित — पूजा, अर्चना और जप के लिए।
  • कृष्ण — सबको आकर्षित करने वाले श्यामसुंदर – "कृष्ण" नाम का अर्थ है श्यामवर्ण और सबको अपनी ओर खींचने वाले। यह नाम गोकुल में गर्ग मुनि ने नामकरण संस्कार के समय रखा था।
  • गोविन्द — गौओं और इन्द्रियों को आनंद देने वाले – गोवर्धन लीला के बाद सुरभि गाय और इन्द्र ने भगवान का अभिषेक कर उन्हें "गोविन्द" नाम दिया। यह नाम गौओं, पृथ्वी और इन्द्रियों के स्वामी का बोध कराता है।
  • गोपाल — गौओं के रक्षक बालकृष्ण – "गोपाल" वह नाम है जो ब्रज के ग्वालबाल कृष्ण की याद दिलाता है, जो गायें चराते और उनकी रक्षा करते थे। घर-घर में पूजे जाने वाले लड्डू गोपाल इसी रूप के प्रतीक हैं।
  • दामोदर — जिनके उदर पर रस्सी बँधी – माता यशोदा ने नटखट कन्हैया को ऊखल से बाँधा, तभी से वे "दामोदर" कहलाए। यह नाम बताता है कि अनंत भगवान केवल प्रेम की डोर से बँधते हैं।
  • माधव — लक्ष्मीपति और मधुवंश के गौरव – "माधव" का अर्थ है लक्ष्मी (मा) के पति, और मधु के वंश में जन्मे। यह नाम भगवान की माधुर्यपूर्ण और ऐश्वर्यपूर्ण दोनों छवियों को जोड़ता है।
  • केशव — केशी का संहार करने वाले, सुंदर केशों वाले – "केशव" नाम की दो पारंपरिक व्याख्याएँ हैं — केशी असुर का वध करने वाले, और सुंदर घुंघराले केशों वाले। यह विष्णु के बारह प्रमुख नामों में पहला है।
  • मधुसूदन — मधु दैत्य का संहार करने वाले – सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ नामक दैत्यों का वध किया, इसलिए वे "मधुसूदन" कहलाए। गीता में अर्जुन इस नाम से भगवान को कई बार पुकारते हैं।
  • मुरारि — मुर दैत्य के शत्रु – नरकासुर के नगर की रक्षा करने वाले पाँच सिर वाले दैत्य मुर का वध करने से श्रीकृष्ण "मुरारि" कहलाए। यह नाम भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान की वीरता का स्मरण कराता है।
  • हृषीकेश — इन्द्रियों के स्वामी – "हृषीकेश" का अर्थ है सभी इन्द्रियों के स्वामी। गीता में संजय और अर्जुन दोनों भगवान को इस नाम से संबोधित करते हैं।
  • अच्युत — जो कभी च्युत नहीं होते – "अच्युत" का अर्थ है जो अपने स्वरूप, वचन और भक्तों से कभी नहीं डिगते। गीता में अर्जुन रथ को सेनाओं के बीच ले जाने की प्रार्थना इसी नाम से करते हैं।
  • वासुदेव — वसुदेव-नंदन, सर्वव्यापी प्रभु – "वासुदेव" का अर्थ है वसुदेव जी के पुत्र, और वह परमात्मा जो सब प्राणियों में वास करता है। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का द्वादशाक्षर मंत्र इसी नाम पर आधारित है।
  • मुकुंद — मुक्ति और भक्ति के दाता – "मुकुंद" का अर्थ है मुक्ति प्रदान करने वाले। कुलशेखर आलवार की "मुकुंदमाला" जैसे स्तोत्र इसी नाम की महिमा गाते हैं।
  • गिरिधारी — गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले – इन्द्र के कोप से ब्रज को बचाने के लिए सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखने वाले श्रीकृष्ण "गिरिधारी" या "गिरधर" कहलाते हैं। मीराबाई के आराध्य "गिरधर गोपाल" यही हैं।
  • श्याम और कान्हा — प्रेम के घरेलू नाम – "श्याम" भगवान के साँवले रूप का नाम है और "कान्हा" या "कन्हैया" कृष्ण का ब्रज का दुलार भरा रूप। ये नाम भगवान को अपना मानने वाले भक्तों के होंठों पर सबसे पहले आते हैं।
  • बाँके बिहारी — त्रिभंग मुद्रा में वृंदावन के विहारी – "बाँके बिहारी" का अर्थ है तीन स्थानों से बाँके (त्रिभंग) खड़े होकर लीला-विहार करने वाले प्रभु। वृंदावन का बाँके बिहारी मंदिर स्वामी हरिदास जी की भक्ति से प्रकट हुए विग्रह के लिए प्रसिद्ध है।
  • रणछोड़ — प्रजा के हित में रण छोड़ने वाले – जरासंध और कालयवन के आक्रमण के समय प्रजा की रक्षा के लिए मथुरा का रणक्षेत्र छोड़ने से श्रीकृष्ण "रणछोड़" कहलाए। गुजरात के डाकोर में वे रणछोड़राय के रूप में पूजे जाते हैं।
  • द्वारकाधीश — द्वारका के राजाधिराज – समुद्र के बीच बसाई गई स्वर्णिम द्वारका नगरी के स्वामी के रूप में श्रीकृष्ण "द्वारकाधीश" कहलाते हैं। गुजरात का द्वारकाधीश मंदिर चार धामों में से एक है।
  • पार्थसारथि — अर्जुन के सारथी – कुरुक्षेत्र के युद्ध में शस्त्र न उठाने का व्रत लेकर अर्जुन का रथ चलाने वाले श्रीकृष्ण "पार्थसारथि" कहलाते हैं। इसी रथ पर उन्होंने भगवद्गीता का उपदेश दिया।
  • योगेश्वर — सब योगों के स्वामी – "योगेश्वर" का अर्थ है योग के परम स्वामी। गीता के अंतिम श्लोक में संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय और नीति है।
  • जगन्नाथ — सारे जगत के नाथ – "जगन्नाथ" का अर्थ है समस्त जगत के स्वामी। पुरी में भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के साथ जगन्नाथ रूप में पूजे जाते हैं और उनकी रथयात्रा विश्वप्रसिद्ध है।
  • श्रीनाथजी — नाथद्वारा के गोवर्धनधारी प्रभु – श्रीनाथजी श्रीकृष्ण का वह स्वरूप हैं जिसमें वे बायाँ हाथ उठाकर गोवर्धन धारण किए हुए हैं। पुष्टिमार्ग के प्रधान आराध्य के रूप में वे राजस्थान के नाथद्वारा में विराजते हैं।
  • ठाकोरजी — घर-घर के प्यारे ठाकुर – "ठाकोरजी" वह प्रेम भरा नाम है जिससे गुजराती और पुष्टिमार्गीय परिवार अपने घर में विराजमान श्रीकृष्ण स्वरूप को पुकारते हैं। उनकी सेवा घर के सबसे प्रिय सदस्य की तरह की जाती है।