भगवद् गीता वर्ल्ड

पत्रं पुष्पं फलं तोयम्

जो कोई भक्त प्रेम से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त की प्रेमपूर्वक दी हुई भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati .
tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ ॥

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भगवान को भेंट का मूल्य नहीं, भाव प्रिय है। सुदामा के मुट्ठी भर चावल और विदुर के घर का साग इसी सत्य के उदाहरण हैं।

जीवन-सूत्र: भोजन और हर काम को पहले भगवान को अर्पित करने का भाव रखें।

Theme
Bhakti
Shloka Ref
9.26
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/chapter/9/26

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