सब कुछ मुझमें पिरोया है, जैसे धागे में मणियाँ
हे धनंजय, मुझसे परे कुछ भी नहीं है। यह सारा जगत मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
mattaḥ parataraṃ nānyatkiñcidasti dhanañjaya .
mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 7.7
माला के मनके अलग-अलग दिखते हैं, पर एक ही धागा उन्हें जोड़े रखता है। उसी तरह संसार की विविधता के पीछे एक ही ईश्वर है, जो सबको धारण करता है।
जीवन-सूत्र: भिन्नताओं के बीच भी सबको जोड़ने वाली एकता को पहचानें।
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- Oneness
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- 7.7
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