मन्मना भव मद्भक्तः
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार स्वयं को मुझमें लगाकर, मुझे परम लक्ष्य मानकर तुम मुझे ही प्राप्त होगे।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru .
māmevaiṣyasi yuktvaivamātmānaṃ matparāyaṇaḥ ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 9.34
भक्ति के चार सरल अंग — स्मरण, प्रेम, पूजा और नमन — इस एक श्लोक में समाए हैं। यही बात श्रीकृष्ण 18.65 में फिर दोहराते हैं, जिससे इसका महत्व स्पष्ट होता है।
जीवन-सूत्र: दिन में कुछ क्षण केवल भगवान के स्मरण के लिए रखें।
- Theme
- Bhakti
- Shloka Ref
- 9.34
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