कृष्ण लीला
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर द्वारका तक की प्रसिद्ध दिव्य लीलाएँ और कथाएँ।
- श्रीकृष्ण जन्म – कंस के कारागार की अँधेरी रात में, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को भगवान श्रीकृष्ण माता देवकी और वसुदेव जी के आठवें पुत्र के रूप में प्रकट हुए।
- वसुदेव जी का यमुना पार गमन – तूफानी रात में वसुदेव जी नवजात कृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल पहुँचे, जहाँ शेषनाग ने छत्र बनकर प्रभु की रक्षा की।
- पूतना वध – कंस की भेजी राक्षसी पूतना विष लगे स्तनों से बालकृष्ण को मारने आई, पर प्रभु ने उसके प्राण ही खींच लिए और उसे माता की गति प्रदान की।
- शकट भंजन लीला – उत्सव के दिन छकड़े के नीचे सोए नन्हे कन्हैया ने अपने कोमल चरणों से ऐसा प्रहार किया कि भारी छकड़ा उलटकर टूट गया और उसमें छिपे असुर का अंत हो गया।
- तृणावर्त उद्धार – बवंडर बनकर आया असुर तृणावर्त बालकृष्ण को आकाश में उड़ा ले गया, पर प्रभु इतने भारी हो गए कि असुर स्वयं ही धरती पर आ गिरा।
- माखन चोर – गोकुल के घर-घर से माखन चुराकर सखाओं और बंदरों में बाँटने वाले नटखट कान्हा की मधुर लीलाएँ, जो वास्तव में भक्तों के हृदय चुराने की लीला हैं।
- मुख में ब्रह्मांड दर्शन – मिट्टी खाने की शिकायत पर जब माता यशोदा ने कान्हा का मुख खुलवाया, तो उन्हें उसमें पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया।
- दामोदर लीला – माता यशोदा ने नटखट कान्हा को ओखली से बाँधना चाहा, पर रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पड़ गई, जब तक प्रभु ने स्वयं प्रेम से बँधना स्वीकार नहीं किया।
- वत्सासुर और बकासुर उद्धार – गोकुल से वृंदावन आने के बाद बछड़े चराते समय श्रीकृष्ण ने बछड़े का रूप धरे वत्सासुर और विशाल बगुले के रूप में आए बकासुर का उद्धार किया।
- अघासुर उद्धार – विशाल अजगर बने अघासुर के खुले मुख को गुफा समझकर ग्वालबाल उसमें चले गए, तब श्रीकृष्ण ने भीतर जाकर अपना शरीर बढ़ाया और सबको मुक्त कराया।
- ब्रह्मा जी का मोह भंग – ब्रह्मा जी ने बछड़ों और ग्वालबालों को छिपा दिया, तब श्रीकृष्ण स्वयं एक वर्ष तक उन सबके रूप में व्रज में रहे, जिसे देखकर ब्रह्मा जी चकित होकर स्तुति करने लगे।
- धेनुकासुर उद्धार – ताल वन के मीठे फलों पर पहरा देने वाले गधे के रूप वाले असुर धेनुक का बलराम जी ने अंत किया, और फिर सबने निर्भय होकर ताड़ के फल खाए।
- कालिया नाग दमन – यमुना को विषैला करने वाले कालिया नाग के फनों पर नृत्य करके श्रीकृष्ण ने उसका अहंकार तोड़ा और उसे रमणक द्वीप भेज दिया।
- दावानल पान – जब भयंकर दावानल ने व्रजवासियों, ग्वालबालों और गौओं को घेर लिया, तब शरणागतों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण ने उस आग को पी लिया।
- वेणु गीत – शरद ऋतु में श्रीकृष्ण की बाँसुरी की तान ने गोपियों, गौओं, नदियों, हिरणों, पक्षियों और देवताओं तक को मोहित कर दिया; यह तान आत्मा के लिए परमात्मा की पुकार है।
- कात्यायनी व्रत और चीर हरण लीला – मार्गशीर्ष मास में व्रज की कुमारियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए देवी कात्यायनी का व्रत किया, और प्रभु ने उन्हें पूर्ण समर्पण की शिक्षा देकर मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया।
- गोवर्धन धारण – इंद्र के क्रोध से उठी सात दिन की प्रलयकारी वर्षा से व्रज को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर छत्र बना दिया।
- महारास लीला – शरद पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण की बाँसुरी सुनकर गोपियाँ सब कुछ छोड़कर आईं, और महारास में प्रभु ने हर गोपी के साथ स्वयं को प्रकट किया। यह आत्मा और परमात्मा के शुद्ध प्रेम की लीला है।
- अक्रूर का आगमन और वृंदावन से विदाई – कंस के भेजे अक्रूर जी श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा ले जाने वृंदावन आए। मार्ग में उनकी भक्ति खिल उठी, और गोपियों का विरह अमर हो गया।
- मथुरा प्रवेश: धोबी, जुलाहा, माली और कुब्जा – मथुरा की गलियों में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण ने अहंकारी धोबी को दंड दिया और जुलाहे, माली सुदामा तथा कुब्जा की सेवा स्वीकार कर उन्हें धन्य कर दिया।
- कंस वध – मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण ने कुब्जा को सुंदर बनाया, महान धनुष तोड़ा, कुवलयापीड़ और चाणूर-मुष्टिक को पराजित किया और अत्याचारी कंस का अंत किया।
- सांदीपनि मुनि का आश्रम और गुरु-दक्षिणा – जगद्गुरु होकर भी श्रीकृष्ण ने अवंती में सांदीपनि मुनि से विद्या पाई और गुरु-दक्षिणा में यमलोक से गुरु का खोया पुत्र लौटा लाए।
- उद्धव का ब्रज-गमन और गोपियों का प्रेम – ज्ञानी उद्धव श्रीकृष्ण का संदेश लेकर ब्रज गए, पर गोपियों का विरह-प्रेम देखकर स्वयं यह सीख गए कि शुद्ध प्रेम ही सबसे ऊँची भक्ति है।
- जरासंध: सत्रह आक्रमण और भीम से मल्लयुद्ध – मगधराज जरासंध ने सत्रह बार मथुरा पर चढ़ाई की और हर बार हारा। बहुत बाद में श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम ने उसका अंत किया और बंदी राजाओं को मुक्ति मिली।
- कालयवन और राजा मुचुकुंद – श्रीकृष्ण कालयवन को एक गुफा में ले गए जहाँ प्राचीन राजा मुचुकुंद सो रहे थे। उनकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन भस्म हो गया और मुचुकुंद को भगवान के दर्शन मिले।
- द्वारका नगरी – जरासंध के बार-बार आक्रमणों से प्रजा की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने समुद्र में विश्वकर्मा से द्वारका बसवाई, जो उनके धाम लौटने के बाद सागर में समा गई।
- रुक्मिणी विवाह – विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने मन से श्रीकृष्ण को पति मान लिया था। उनके पत्र पर प्रभु आए और अंबिका मंदिर से उन्हें रथ पर ले गए।
- स्यमंतक मणि की कथा – सूर्यदेव की दी हुई स्यमंतक मणि के खोने पर श्रीकृष्ण पर झूठा कलंक लगा, जिसे मिटाने के लिए उन्होंने जांबवान की गुफा से मणि वापस लाई।
- नरकासुर वध और सोलह हज़ार राजकुमारियों की मुक्ति – सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर श्रीकृष्ण ने प्राग्ज्योतिषपुर में मुर और नरकासुर का अंत किया और बंदी सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियों को सम्मान दिया।
- पारिजात हरण – सत्यभामा की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण स्वर्ग से पारिजात वृक्ष द्वारका ले आए, और इंद्र का क्षणिक अभिमान भी इसी लीला में शांत हुआ।
- राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध – युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण की अग्रपूजा हुई। शिशुपाल ने अपमान की सीमा पार की, तो सौ अपराध पूरे होने पर सुदर्शन चक्र ने उसका अंत किया और उसकी ज्योति श्रीकृष्ण में लीन हो गई।
- द्रौपदी की लाज-रक्षा – हस्तिनापुर की द्यूत-सभा में जब दुःशासन ने द्रौपदी का वस्त्र खींचा, तब उनकी पूर्ण शरणागति की पुकार पर गोविंद ने उनकी लाज बचाई।
- श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन – गुरुकुल के निर्धन ब्राह्मण मित्र मुट्ठी भर चिवड़ा लेकर द्वारका पहुँचे, और श्रीकृष्ण ने उस प्रेम-भेंट के बदले उन्हें बिना कहे सब कुछ दे दिया।
- अर्जुन और दुर्योधन का चुनाव – युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। एक ओर नारायणी सेना थी और दूसरी ओर निःशस्त्र श्रीकृष्ण, और अर्जुन ने केवल श्रीकृष्ण को चुना।
- शांतिदूत श्रीकृष्ण – युद्ध टालने के लिए श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए और पांडवों के लिए केवल पाँच गाँव माँगे। अहंकारी दुर्योधन ने उन्हें बंदी बनाना चाहा, तब प्रभु ने सभा में अपना दिव्य रूप प्रकट किया।
- श्रीकृष्ण और कर्ण – श्रीकृष्ण ने कर्ण को बताया कि वे कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हैं और उन्हें राजसिंहासन का प्रस्ताव दिया। मित्रता और कृतज्ञता से बँधे दानवीर कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा।
- कुरुक्षेत्र में गीता उपदेश – युद्धभूमि में शोक से व्याकुल अर्जुन को सारथी बने श्रीकृष्ण ने आत्मा, कर्म, ज्ञान और भक्ति का अमर उपदेश दिया, जो भगवद्गीता कहलाया।
- विश्वरूप दर्शन – गीता के ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि देकर अपना विराट विश्वरूप दिखाया, जिसमें समस्त सृष्टि और स्वयं काल समाया था।
- भीष्म पितामह और श्रीकृष्ण – शस्त्र न उठाने का वचन देने वाले श्रीकृष्ण अपने भक्त भीष्म का वचन रखने के लिए चक्र लेकर उनकी ओर दौड़े। शरशय्या पर लेटे भीष्म ने प्रभु की स्तुति की और युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम दिया।
- वीर अभिमन्यु – श्रीकृष्ण के भांजे अभिमन्यु ने तेरहवें दिन अकेले चक्रव्यूह में प्रवेश कर अद्भुत वीरता दिखाई और वीरगति पाई। अर्जुन ने जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा की, जिसे श्रीकृष्ण की सहायता से पूरा किया।
- गर्भ में परीक्षित की रक्षा – अश्वत्थामा ने रात में सोते शिविर पर आक्रमण किया और उत्तरा के गर्भ की ओर ब्रह्मास्त्र छोड़ा। श्रीकृष्ण ने गर्भ में प्रवेश कर पांडवों के अंतिम वंशज परीक्षित की रक्षा की।
- यदुवंश का अंत – गांधारी के शाप और पिंडारक में ऋषियों के शाप से निकले लोहे के मूसल ने अहंकारी यदुवंश के विनाश का बीज बोया। प्रभास में यादव आपस में लड़कर नष्ट हो गए, और श्रीकृष्ण शांत भाव से सब स्वीकार करते रहे।
- श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन – प्रभास में पीपल के नीचे विराजे श्रीकृष्ण के चरण को जरा शिकारी ने हिरण समझकर बाण मारा। प्रभु ने उसे क्षमा कर आशीर्वाद दिया और अपने नित्य धाम लौट गए, जिसके साथ कलियुग का आरंभ हुआ।