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भगवद् गीता अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग

परम पुरुषोत्तम का योग।

20 श्लोक

इस अध्याय के सभी श्लोक

  1. 15.1 – श्रीभगवानुवाच – श्रीभगवान ने कहा — ज्ञानीजन एक ऐसे अविनाशी अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वर्णन करते हैं जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ…
  2. 15.2 – अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा – उस वृक्ष की शाखाएँ, जो तीनों गुणों से बढ़ी हुई हैं और जिनकी कोंपलें विषय हैं, नीचे और ऊपर सब ओर फैली हुई हैं।
  3. 15.3 – न रूपमस्येह तथोपलभ्यते – इस संसार-वृक्ष का जैसा रूप बताया गया है, वैसा यहाँ (संसार में रहते हुए) देखने में नहीं आता; न इसका अन्त, न…
  4. 15.4 – ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं – उसके बाद उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचकर फिर कोई लौटकर नहीं आता।
  5. 15.5 – निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा – जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो निरन्तर आत्म-तत्त्व में स्थित हैं…
  6. 15.6 – न तद्भासयते सूर्यो न – उस (परम पद) को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि।
  7. 15.7 – ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः – इस जीव-लोक में जीव बना हुआ यह सनातन आत्मा मेरा ही अंश है; वही प्रकृति में स्थित मन सहित छहों इन्द्रियों को…
  8. 15.8 – शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः – जैसे वायु फूल आदि स्थानों से गन्ध को लेकर चली जाती है, वैसे ही देह का स्वामी जीवात्मा जब एक शरीर छोड़ता है…
  9. 15.9 – श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च – यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक — इन इन्द्रियों तथा मन का आश्रय लेकर विषयों का सेवन (भोग) करता है
  10. 15.10 – उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं – शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर विषयों को भोगते हुए भी इस जीवात्मा को…
  11. 15.11 – यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् – प्रयत्नशील योगी अपने भीतर स्थित इस आत्मा को देख लेते हैं; परन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ है, ऐसे…
  12. 15.12 – यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् – जो तेज सूर्य में रहकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है, उस तेज…
  13. 15.13 – गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा – मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसमय चन्द्रमा बनकर सब…
  14. 15.14 – अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां – मैं ही वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणियों के शरीर में रहता हूँ और प्राण तथा अपान से मिलकर चार प्रकार के अन्न को…
  15. 15.15 – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो – मैं ही सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है।
  16. 15.16 – द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर – इस लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं — क्षर (नश्वर) और अक्षर (अविनाशी)।
  17. 15.17 – उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युधाहृतः – परन्तु उत्तम पुरुष इन दोनों से भिन्न है, जिसे परमात्मा कहा गया है; वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश…
  18. 15.18 – यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः – क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी श्रेष्ठ हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं ‘पुरुषोत्तम’ नाम से…
  19. 15.19 – यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् – हे भारत! जो मोहरहित व्यक्ति मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जानने वाला होकर सम्पूर्ण भाव से…
  20. 15.20 – इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ – हे निष्पाप भारत! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मैंने तुमसे कहा।

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