भगवद् गीता वर्ल्ड

वाणी का तप

जो वाणी किसी को उद्वेग न दे, सत्य हो, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय (शास्त्र-पाठ) का अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat .
svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate ॥

संबंधित गीता श्लोक: गीता 17.15

शब्दों में बड़ी शक्ति है — वे घाव भी दे सकते हैं और मरहम भी बन सकते हैं। गीता सत्य, प्रिय और हितकारी — तीनों गुणों वाली वाणी को तप मानती है।

जीवन-सूत्र: बोलने से पहले सोचें — क्या यह सच है, मधुर है और उपयोगी है?

Theme
Speech
Shloka Ref
17.15
Shloka Path
/chapter/17/15

इसी श्रेणी में और – गीता के उपदेश