संतुलित जीवन ही योग है
जिसका आहार-विहार उचित है, जिसके कर्म संयमित हैं और जिसका सोना-जागना नियमित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu .
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 6.17
गीता अति को नहीं, संतुलन को महत्व देती है — न बहुत अधिक खाना, न बिल्कुल भूखे रहना; न बहुत सोना, न बहुत जागना। स्वस्थ दिनचर्या ही साधना की नींव है।
जीवन-सूत्र: भोजन, काम, आराम और नींद का समय नियमित करें।
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- 6.17
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