ज्ञानी की समदृष्टि
ज्ञानीजन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
vidyāvinayasampanne brāhmaṇe gavi hastini .
śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 5.18
शरीर, जाति और रूप अलग-अलग हैं, पर सबमें एक ही आत्मा और एक ही परमात्मा निवास करते हैं। यह दृष्टि भेदभाव मिटाकर सबके प्रति करुणा जगाती है।
जीवन-सूत्र: हर जीव में ईश्वर का अंश देखकर सबसे सम्मान से व्यवहार करें।
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- Equal vision
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- 5.18
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- /chapter/5/18