समत्व ही योग है
हे धनंजय, आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समता योग कहलाती है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 2.48
सफलता में अहंकार और असफलता में निराशा, दोनों मन को अस्थिर करते हैं। गीता के अनुसार दोनों में संतुलित रहना ही सच्चा योग है।
जीवन-सूत्र: प्रशंसा और आलोचना दोनों को समान भाव से स्वीकार करना सीखें।
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- Equanimity
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- 2.48
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