अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है
हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और कठिनाई से वश में होता है, परंतु हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
श्रीभगवानुवाच ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
śrībhagavānuvāca .
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam .
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ॥
संबंधित गीता श्लोक: गीता 6.35
श्रीकृष्ण अर्जुन की कठिनाई को स्वीकार करते हैं — मन सचमुच वायु की तरह चंचल है। पर नियमित अभ्यास और व्यर्थ आसक्तियों से धीरे-धीरे दूरी बनाकर कोई भी मन को शांत कर सकता है।
जीवन-सूत्र: रोज़ थोड़ी देर ध्यान या नाम-जप करें; निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।
- Theme
- Mastering the mind
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- 6.35
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