भगवद् गीता वर्ल्ड

अपना उद्धार स्वयं करो

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, अपना पतन नहीं होने देना चाहिए। मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ॥

संबंधित गीता श्लोक: गीता 6.5

वश में किया हुआ मन सबसे अच्छा मित्र है और अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु। अपने विचारों और आदतों की ज़िम्मेदारी स्वयं लेना ही आत्म-उन्नति की पहली सीढ़ी है।

जीवन-सूत्र: अपनी एक अच्छी आदत को रोज़ मज़बूत करें।

Theme
Mastering the mind
Shloka Ref
6.5
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/chapter/6/5

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