भगवद् गीता वर्ल्ड

गर्भ में परीक्षित की रक्षा

अश्वत्थामा ने रात में सोते शिविर पर आक्रमण किया और उत्तरा के गर्भ की ओर ब्रह्मास्त्र छोड़ा। श्रीकृष्ण ने गर्भ में प्रवेश कर पांडवों के अंतिम वंशज परीक्षित की रक्षा की।

जब महायुद्ध लगभग समाप्त हो चुका था और दुर्योधन मरणासन्न पड़ा था, तब द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु के क्रोध में जलते हुए एक भयानक निर्णय लिया। आधी रात को वह सोते हुए पांडव शिविर में घुसा और धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पाँचों युवा पुत्रों तथा अनेक योद्धाओं का वध कर दिया। पाँचों पांडव उस रात शिविर में नहीं थे, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के साथ अन्यत्र ठहरे थे।

यह समाचार सुनकर द्रौपदी शोक में डूब गईं। पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा किया। घिर जाने पर उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, जिसे महाभारत में ब्रह्मशिर कहा गया है, ऐसा अस्त्र जो लोकों को जला सकता था। श्रीकृष्ण की सलाह से अर्जुन ने भी उसे शांत करने के लिए अपना अस्त्र छोड़ा। तब महर्षि व्यास और देवर्षि नारद दोनों अस्त्रों के बीच प्रकट हुए और दोनों योद्धाओं से अस्त्र वापस लेने को कहा। अर्जुन ने अपना अस्त्र लौटा लिया, पर अश्वत्थामा ऐसा नहीं कर सका, और द्वेषवश उसने उसे पांडव स्त्रियों के गर्भ की ओर मोड़ दिया, ताकि वंश ही समाप्त हो जाए। अभिमन्यु की विधवा उत्तरा के गर्भ में पांडवों का अंतिम वंशज था।

उत्तरा रक्षा की पुकार करती हुई श्रीकृष्ण के पास दौड़ीं। श्रीमद्भागवत बताता है कि प्रभु ने अपनी योगमाया से उनके गर्भ में प्रवेश किया और शिशु की रक्षा की। शिशु ने एक छोटा-सा तेजस्वी रूप गदा घुमाते हुए अपनी रक्षा करते देखा, और जन्म के बाद वह मानो हर चेहरे में उसी रूप को खोजता रहा; इसलिए उसका नाम परीक्षित पड़ा, अर्थात परीक्षा करने वाला। महाभारत बताता है कि शिशु निष्प्राण जन्मा था और श्रीकृष्ण ने अपने सत्य के बल से उसे जीवित कर दिया।

अश्वत्थामा का अभिमान चूर हुआ। भागवत में द्रौपदी ने बड़ी करुणा से कहा कि गुरुपुत्र का वध न किया जाए, ताकि उसकी माता को वैसे न रोना पड़े जैसे वे स्वयं रोई थीं। अर्जुन ने उसके मस्तक की मणि निकाल ली और उसे अपमानित करके छोड़ दिया। महाभारत में श्रीकृष्ण ने कहा कि वह तीन हजार वर्षों तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा।

इसी समय कुंती ने श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध स्तुति की और एक अनोखा वर माँगा: "विपदः सन्तु ताः शश्वत्" — हम पर बार-बार विपत्तियाँ आएँ, क्योंकि उनमें हमें आपके दर्शन होते हैं, जो जन्म-मृत्यु से मुक्त कर देते हैं। यह लीला सिखाती है कि भगवान गर्भ में भी असहाय की रक्षा करते हैं, और करुणा प्रतिशोध से बड़ी है।

Source
Mahabharata, Sauptika Parva and Ashvamedhika Parva; Shrimad Bhagavatam, Canto 1, ch. 7, 8 and 12
Place
Kurukshetra – banks of the Ganga – Hastinapura
Lesson
भगवान गर्भ में भी असहाय की रक्षा करते हैं; करुणा प्रतिशोध से बड़ी है।

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