माखन चोर
गोकुल के घर-घर से माखन चुराकर सखाओं और बंदरों में बाँटने वाले नटखट कान्हा की मधुर लीलाएँ, जो वास्तव में भक्तों के हृदय चुराने की लीला हैं।
जब बालकृष्ण घुटनों के बल चलना छोड़कर अपने पैरों पर दौड़ने लगे, तब गोकुल में उनकी सबसे प्रिय लीला आरंभ हुई, माखन चोरी की लीला। सुबह-सुबह जब गोपियाँ दही मथकर ताजा माखन निकालतीं और उसे ऊँचे छींकों पर लटका देतीं, तब नन्हे कान्हा अपने सखाओं की टोली लेकर चुपके से उनके घरों में पहुँच जाते।
यदि माखन की मटकी बहुत ऊँची होती, तो वे ओखली और पीढ़े एक के ऊपर एक रखकर चढ़ जाते, या किसी सखा के कंधे पर खड़े हो जाते। कभी डंडे से मटकी में छेद कर देते और नीचे मुँह खोलकर टपकता माखन पीते। अँधेरे कमरे में भी उनके आभूषणों की चमक से उजाला हो जाता था। जो माखन मिलता, उसे वे अकेले नहीं खाते थे, बल्कि सखाओं को खिलाते और आँगन में बैठे बंदरों को भी बाँट देते। यदि बंदर भी न खाते, तो कान्हा कहते कि यह माखन अच्छा नहीं है, और मटकी फोड़ देते।
श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि गोपियाँ यशोदा जी के पास शिकायत लेकर आतीं कि तुम्हारा लाला हमारे घर का माखन चुराता है, बछड़ों को समय से पहले खोल देता है और हमारे सोते बच्चों को रुला देता है। पर जब वे शिकायत करतीं, तब कान्हा माता के पास ऐसे भोले बनकर बैठ जाते कि गोपियाँ उनका मुख देखते ही हँस पड़तीं और अपनी शिकायत भूल जातीं। सच तो यह था कि गोपियाँ मन ही मन प्रतीक्षा करती रहती थीं कि कान्हा आज उनके घर आएँ।
इस लीला का भाव अत्यंत गहरा है। माखन शुद्ध और कोमल हृदय का प्रतीक है, जो जीवन रूपी दूध को साधना से मथकर निकलता है। भगवान ऐसे ही प्रेम भरे हृदय को चुराते हैं। इसीलिए भक्त उन्हें प्रेम से माखन चोर और चितचोर कहते हैं। जिस घर में प्रभु चोरी करने आएँ, वह घर धन्य हो जाता है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 8
- Place
- Gokul
- Lesson
- भगवान धन-वैभव नहीं, बल्कि शुद्ध और प्रेम से भरा हृदय चाहते हैं।