अक्रूर का आगमन और वृंदावन से विदाई
कंस के भेजे अक्रूर जी श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा ले जाने वृंदावन आए। मार्ग में उनकी भक्ति खिल उठी, और गोपियों का विरह अमर हो गया।
जब देवर्षि नारद ने कंस को बताया कि गोकुल का वह साँवला बालक वास्तव में देवकी का आठवाँ पुत्र है, तो कंस का भय एक षड्यंत्र में बदल गया। उसने मथुरा में धनुष-यज्ञ नाम का बड़ा उत्सव घोषित किया और सोचा कि श्रीकृष्ण और बलराम को वहाँ बुलाकर अपने हाथी और पहलवानों से मरवा देगा। इस काम के लिए उसने यदुवंश के सम्मानित वृद्ध अक्रूर जी को चुना, क्योंकि उसे पता था कि बालक उन पर भरोसा करेंगे।
कंस यह नहीं जानता था कि अक्रूर जी हृदय से भगवान के भक्त हैं। रथ जब ब्रज की ओर चला, तो अक्रूर जी राजा के आदेश के बारे में नहीं, केवल इस बात पर विचार कर रहे थे कि आज वे उन प्रभु के दर्शन करेंगे जिन्हें बड़े-बड़े योगी ध्यान में खोजते हैं। संध्या के समय वृंदावन की सीमा पर पहुँचकर जब उन्होंने धूल में कमल, ध्वजा और वज्र के चिह्नों वाले श्रीकृष्ण के चरण-चिह्न देखे, तो वे रथ से कूद पड़े और आनंद के आँसू बहाते हुए उस रज में लोटने लगे।
श्रीकृष्ण और बलराम ने उनका प्रेम से स्वागत किया, उनके चरण धोए और भोजन कराया। नंद बाबा ने राजा का निमंत्रण सुना और तय हुआ कि अगली सुबह सभी ग्वाले दूध, मक्खन आदि उपहार लेकर मथुरा जाएँगे।
यह समाचार फैलते ही गोपियों का हृदय टूट गया। उन्होंने पूरी रात रोते हुए बिताई और सुबह रथ को घेर लिया। वे कहने लगीं कि जिसका नाम अक्रूर है, अर्थात जो क्रूर नहीं, वही आज ब्रज के प्राण छीनकर ले जा रहा है। श्रीकृष्ण ने लौटने का संदेश देकर उन्हें धीरज बँधाया। रथ आगे बढ़ गया और गोपियाँ तब तक खड़ी देखती रहीं जब तक पहियों की धूल भी नहीं बैठ गई।
मार्ग में अक्रूर जी यमुना में स्नान और संध्या-वंदन के लिए रुके। जल के भीतर उन्होंने श्रीकृष्ण और बलराम को देखा, जबकि दोनों भाई रथ पर बैठे थे। फिर उन्होंने देखा कि प्रभु सहस्र फणों वाले अनंत शेष पर विराजमान हैं और ऋषि तथा देवता उनकी सेवा कर रहे हैं। भाव-विभोर होकर अक्रूर जी ने भगवान की स्तुति की। जल से बाहर आने पर वह दर्शन लुप्त हो गया और श्रीकृष्ण ऐसे मुस्कुराए मानो सब कुछ जानते हों।
यह लीला सिखाती है कि भगवान द्वेष से भरे काम को भी भक्ति का अवसर बना देते हैं, और ब्रज का प्रेम सबसे ऊँचा प्रेम है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 36–40
- Place
- Vrindavan – Yamuna – Mathura
- Lesson
- भगवान द्वेष से जन्मे कार्य को भी भक्ति का अवसर बना देते हैं।