धेनुकासुर उद्धार
ताल वन के मीठे फलों पर पहरा देने वाले गधे के रूप वाले असुर धेनुक का बलराम जी ने अंत किया, और फिर सबने निर्भय होकर ताड़ के फल खाए।
जब कृष्ण और बलराम कुछ बड़े हुए, तो उन्हें बछड़ों के स्थान पर गौएँ चराने की अनुमति मिल गई। वे अपने सखाओं के साथ वृंदावन के वनों में घूमते, पक्षियों के साथ गाते, मोरों के साथ नाचते और थके हुए बड़े भाई के पैर दबाकर उनकी सेवा करते।
एक दिन श्रीदामा, सुबल और स्तोककृष्ण आदि सखाओं ने कहा कि हे राम, हे कृष्ण, पास ही एक ताल वन है, जहाँ ताड़ के वृक्ष मीठे, पके फलों से लदे हैं। उनकी सुगंध यहाँ तक आ रही है। पर वहाँ धेनुक नाम का एक भयानक असुर गधे के रूप में अपने साथियों के साथ रहता है। वह किसी मनुष्य या पशु को वहाँ जाने नहीं देता। यदि आप चाहें तो हम वे फल खा सकते हैं।
सखाओं की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई सबको लेकर ताल वन पहुँचे। बलराम जी ने अपनी भुजाओं से ताड़ के वृक्षों को ऐसे हिलाया कि पके फल धड़ाधड़ गिरने लगे। आवाज़ सुनकर धेनुकासुर क्रोध से धरती कँपाता हुआ दौड़ा आया और अपनी पिछली टाँगों से बलराम जी की छाती पर प्रहार किया। बलराम जी ने उसकी दोनों पिछली टाँगें पकड़ लीं, उसे आकाश में घुमाया और एक ऊँचे ताड़ के वृक्ष पर पटक दिया। असुर के प्राण वहीं निकल गए, और वह वृक्ष गिरते हुए दूसरे वृक्षों को भी गिराता चला गया।
यह देखकर धेनुक के साथी गधे भी आक्रमण करने आए। कृष्ण और बलराम ने उन्हें भी खेल-खेल में पकड़कर ताड़ के वृक्षों पर फेंक दिया। देवताओं ने पुष्प बरसाए और दुंदुभियाँ बजाईं। उस दिन से ताल वन सबके लिए खुल गया। सखाओं ने आनंद से मीठे फल खाए, और फिर व्रजवासी और पशु भी निर्भय होकर वहाँ जाने लगे।
यह लीला सिखाती है कि भगवान की कृपा उस अड़चन को हटा देती है जो जीवन के मीठे फलों को रोके खड़ी हो। स्वार्थ और जड़ता रूपी गधा तभी हटता है जब भगवान और उनके भक्त का बल साथ हो।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 15
- Place
- Talavana, Vraja
- Lesson
- भगवान की कृपा जीवन के मीठे फलों के मार्ग की हर अड़चन को हटा देती है।