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रुक्मिणी विवाह

विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने मन से श्रीकृष्ण को पति मान लिया था। उनके पत्र पर प्रभु आए और अंबिका मंदिर से उन्हें रथ पर ले गए।

विदर्भ के राजा भीष्मक कुंडिनपुर से राज्य करते थे। उनके पाँच पुत्र और एक पुत्री थी, रुक्मिणी, जिन्हें स्वयं लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। पिता की सभा में आने वाले अतिथियों से उन्होंने श्रीकृष्ण के रूप, ज्ञान और गुणों के बारे में सुना था, और मन ही मन उन्हें पति के रूप में चुन लिया था। परिवार के बड़े इससे प्रसन्न थे, पर बड़े भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से द्वेष रखते थे और ज़िद पर अड़े थे कि रुक्मिणी का विवाह उनके मित्र चेदि-नरेश शिशुपाल से हो। विवाह की तिथि तय कर दी गई।

रुक्मिणी ने साहस नहीं खोया। उन्होंने एक विश्वसनीय ब्राह्मण को बुलाया और उसके हाथ द्वारका एक पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि मैंने स्वयं को केवल आपको समर्पित कर दिया है, सिंह के भाग को शिशुपाल न ले जाए। उन्होंने उपाय भी बताया कि विवाह से पहले दिन वधू नगर के बाहर देवी अंबिका की पूजा करने जाती है। यदि आप नहीं आए, तो मैं प्राण त्याग दूँगी और आने वाले जन्मों में आपको पाने का प्रयास करूँगी।

श्रीकृष्ण ने पत्र पढ़ा, मुस्कुराए और कहा कि मेरा मन भी रुक्मिणी में ही लगा है। वे तुरंत ब्राह्मण के साथ रथ पर चल पड़े, और संकट की आशंका से बलराम जी यादव सेना लेकर पीछे-पीछे गए। कुंडिनपुर में जरासंध जैसे राजा शिशुपाल का साथ देने के लिए इकट्ठे थे। रुक्मिणी चिंता में प्रतीक्षा कर रही थीं, तभी उनकी बाईं आँख और भुजा फड़कने लगी, जो शुभ संकेत था। उसी समय ब्राह्मण शुभ समाचार लेकर लौट आए।

विवाह के दिन रुक्मिणी पैदल अंबिका मंदिर गईं, देवी की प्रार्थना की और बाहर आईं। जब इकट्ठे राजा उन्हें निहार रहे थे, तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुए, सबकी आँखों के सामने उन्हें अपने रथ पर बिठाया और चल दिए। क्रोधित राजाओं ने पीछा किया, पर बलराम जी और यादवों ने उन्हें खदेड़ दिया।

रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीकृष्ण को मारे बिना कुंडिनपुर नहीं लौटूँगा। उसने रथ का पीछा कर युद्ध किया, पर श्रीकृष्ण ने उसके सारे अस्त्र-शस्त्र तोड़ दिए और प्रहार के लिए तलवार उठाई। रुक्मिणी श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर भाई के प्राणों की भीख माँगने लगीं। श्रीकृष्ण ने उसे जीवनदान दिया, पर पराजय के चिह्न के रूप में उसके सिर और मूँछों को जगह-जगह से मूँड़कर उसे बाँध दिया। बाद में बलराम जी ने रुक्मी को छुड़ाया और रुक्मिणी को प्रेम से सांत्वना दी।

द्वारका में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह बड़े आनंद से संपन्न हुआ। श्रीमद्भागवत कहता है कि जो श्रद्धा से यह कथा सुनता है, उसे शांति और सुख की प्राप्ति होती है।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 52–54
Place
Kundinapura (Vidarbha) – Dwarka
Lesson
जो हृदय पूरी तरह भगवान को समर्पित है, उसकी पुकार प्रभु अवश्य सुनते हैं।

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