ब्रह्मा जी का मोह भंग
ब्रह्मा जी ने बछड़ों और ग्वालबालों को छिपा दिया, तब श्रीकृष्ण स्वयं एक वर्ष तक उन सबके रूप में व्रज में रहे, जिसे देखकर ब्रह्मा जी चकित होकर स्तुति करने लगे।
अघासुर के उद्धार के बाद श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना के रेतीले तट पर भोजन करने बैठे। बालक कमल की पंखुड़ियों की तरह उनके चारों ओर घेरा बनाकर बैठे और बीच में कृष्ण कमल के केंद्र की भाँति शोभा पा रहे थे। उनकी कमर में बाँसुरी खुँसी थी, हाथ में दही-भात का कौर था और वे हँसी-ठिठोली करते हुए सबके साथ भोजन कर रहे थे। स्वर्ग से देवता यह अद्भुत दृश्य देख रहे थे।
तभी बछड़े हरी घास के लालच में दूर वन में निकल गए। सखा चिंतित हुए, तो कृष्ण बोले कि तुम भोजन करते रहो, मैं बछड़ों को ढूँढ लाता हूँ, और हाथ में कौर लिए ही चल पड़े। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी, जो अघासुर की मुक्ति देखकर चकित थे, भगवान की और महिमा देखना चाहते थे। उन्होंने पहले बछड़ों को और फिर सब ग्वालबालों को अपनी माया से एक गुफा में सुलाकर छिपा दिया।
कृष्ण ने सब कुछ जान लिया। माताओं और गौओं को दुख न हो, इसलिए वे स्वयं ही प्रत्येक बछड़ा और प्रत्येक ग्वालबाल बन गए, उनके वैसे ही शरीर, वस्त्र, लाठी, बाँसुरी, स्वभाव और बोलचाल के साथ। संध्या को सब घर लौटे। माताओं और गौओं का अपने बालकों और बछड़ों पर प्रेम पहले से भी कहीं अधिक उमड़ पड़ा, क्योंकि अब उनके रूप में स्वयं भगवान थे। इस प्रकार पूरा एक वर्ष बीत गया। वर्ष के अंत के निकट बलराम जी ने इस अधिक प्रेम का रहस्य जान लिया।
ब्रह्मा जी के लोक के एक क्षण में धरती का एक वर्ष बीत चुका था। लौटकर उन्होंने देखा कि जिन्हें उन्होंने छिपाया था वे वहीं सो रहे हैं, और वैसे ही बालक और बछड़े कृष्ण के साथ खेल भी रहे हैं। वे सोच में पड़ गए कि सच्चे कौन हैं। फिर उन्हें सब बालक और बछड़े चतुर्भुज विष्णु रूप में दिखे, जिनकी असंख्य ब्रह्मा पूजा कर रहे थे। ब्रह्मा जी का अहंकार गल गया। जब यह दृश्य हटा, तो उन्होंने देखा कि वही नन्हा ग्वाला हाथ में कौर लिए बछड़ों को खोज रहा है।
ब्रह्मा जी अपने हंस से उतरकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और भावपूर्ण स्तुति की कि हे प्रभु, व्रज के घास का तिनका बनना भी मेरा सौभाग्य होगा। भगवान ने बालकों को लौटाया, जिन्हें लगा कि बस एक पल बीता है। यह लीला सिखाती है कि भगवान की महिमा को बुद्धि से नापा नहीं जा सकता, केवल विनम्र भक्ति से अनुभव किया जा सकता है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 13–14
- Place
- Banks of the Yamuna, Vrindavan
- Lesson
- भगवान की महिमा बुद्धि से नापी नहीं जा सकती, उसे केवल विनम्र भक्ति से अनुभव किया जा सकता है।