अघासुर उद्धार
विशाल अजगर बने अघासुर के खुले मुख को गुफा समझकर ग्वालबाल उसमें चले गए, तब श्रीकृष्ण ने भीतर जाकर अपना शरीर बढ़ाया और सबको मुक्त कराया।
एक दिन प्रातःकाल श्रीकृष्ण अपने सखाओं और असंख्य बछड़ों के साथ वन में खेलने निकले। ग्वालबाल हँसते, गाते, बाँसुरी बजाते, पक्षियों की बोली की नकल करते और एक-दूसरे के छींके छीनकर खेलते चल रहे थे। उनका आनंद देखकर देवता भी सोचते थे कि इन बालकों का भाग्य कितना महान है।
इसी आनंद को देखकर कंस का भेजा हुआ असुर अघासुर जल उठा। वह पूतना और बकासुर का छोटा भाई था और अपने भाई-बहन की मृत्यु का बदला लेना चाहता था। उसने एक अत्यंत विशाल अजगर का रूप धारण किया और मार्ग में मुँह खोलकर लेट गया। उसका निचला होंठ धरती पर था और ऊपरी होंठ मानो बादलों को छू रहा था। उसका मुख एक पर्वत की गुफा जैसा दिखता था, जीभ चौड़ी सड़क जैसी और साँस गर्म आँधी जैसी।
बालकों ने उसे देखा और आपस में कहने लगे कि यह तो कोई सुंदर गुफा है। किसी ने कहा कि यदि यह कोई अजगर हुआ भी, तो क्या, हमारा कन्हैया इसे भी वैसे ही मार देगा जैसे उसने बकासुर को मारा था। ऐसा कहकर वे हँसते-ताली बजाते बछड़ों सहित उसके मुख में प्रवेश कर गए।
कृष्ण सब जानते थे। अपने सखाओं को बचाने के लिए वे स्वयं भी उस मुख में चले गए। असुर ने मुँह बंद करना चाहा, पर कृष्ण ने उसके गले में अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि उसकी साँस रुक गई। उसके प्राण सिर का मार्ग फोड़कर बाहर निकले। फिर भगवान ने अपनी अमृतमयी दृष्टि से सब सखाओं और बछड़ों को जीवित कर दिया और वे बाहर आ गए। असुर के शरीर से एक दिव्य ज्योति निकलकर श्रीकृष्ण में समा गई। भगवान का स्पर्श पाकर उस पापी को भी मुक्ति मिल गई।
यह लीला सिखाती है कि जो भगवान पर पूरा भरोसा रखता है, वह संकट के मुख में भी सुरक्षित रहता है, क्योंकि प्रभु स्वयं उसके साथ भीतर तक चले आते हैं।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 12
- Place
- Forest of Vrindavan
- Lesson
- जो भगवान पर पूरा भरोसा रखता है, वह संकट के मुख में भी सुरक्षित रहता है।