भगवद् गीता वर्ल्ड

दावानल पान

जब भयंकर दावानल ने व्रजवासियों, ग्वालबालों और गौओं को घेर लिया, तब शरणागतों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण ने उस आग को पी लिया।

कालिय नाग का दमन करके जब श्रीकृष्ण यमुना से बाहर आए, तो सारे व्रजवासी आनंद से भर गए। वे इतने थके हुए थे कि उस रात घर न लौटकर यमुना के तट पर ही सो गए। आधी रात को अचानक सूखे वन में भयंकर आग भड़क उठी और चारों ओर से सोते हुए व्रजवासियों को घेरने लगी। लपटों की गर्मी से जागकर सब घबरा उठे और कृष्ण-बलराम की शरण में जाकर पुकारने लगे कि हे कृष्ण, हम तुम्हारे ही हैं, इस आग से हमें बचाओ। अपने प्रियजनों की यह दशा देखकर अनंत शक्ति वाले भगवान ने उस भयंकर अग्नि को पी लिया।

कुछ समय बाद एक और ऐसी ही घटना हुई। ग्वालबाल खेल में मग्न थे और उनकी गौएँ हरी घास खाती-खाती दूर मुंजाटवी नामक सरकंडों के घने वन में जा पहुँचीं। जब बालक उन्हें खोजते हुए वहाँ पहुँचे, तभी तेज़ हवा के साथ वन में आग लग गई। सूखे सरकंडे धू-धू करके जलने लगे और लपटें चारों ओर से उनकी ओर बढ़ने लगीं। गौएँ और बालक भय से काँपने लगे।

उन्होंने पुकारा कि हे कृष्ण, हे बलराम, हम तुम्हारी शरण में हैं, हमें बचाओ। भगवान ने मुस्कुराकर कहा कि डरो मत, बस अपनी आँखें बंद कर लो। बालकों ने अपने सखा की बात पर पूरा विश्वास करके आँखें मूँद लीं। उसी क्षण योगेश्वर श्रीकृष्ण ने वह भयंकर दावानल पी लिया। जब बालकों ने आँखें खोलीं, तो देखा कि आग का कहीं नाम नहीं है और वे अपनी गौओं सहित भांडीर वट के पास अपने पुराने स्थान पर सुरक्षित खड़े हैं। वे चकित होकर सोचने लगे कि हमारा कन्हैया अवश्य कोई देवता है।

संतजन कहते हैं कि यह दावानल संसार के दुखों और विषयों की आग का प्रतीक है, जो जीव को चारों ओर से घेर लेती है। जब जीव पूरे विश्वास से भगवान को पुकारता है और अपने अहंकार की आँखें बंद करके उनकी आज्ञा मानता है, तब प्रभु स्वयं उस आग को पी जाते हैं।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 17 and 19
Place
Banks of the Yamuna and Munjatavi, Vraja
Lesson
जो पूरे विश्वास से भगवान को पुकारता है, उसके जीवन की हर आग को प्रभु स्वयं पी जाते हैं।

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