तृणावर्त उद्धार
बवंडर बनकर आया असुर तृणावर्त बालकृष्ण को आकाश में उड़ा ले गया, पर प्रभु इतने भारी हो गए कि असुर स्वयं ही धरती पर आ गिरा।
एक दिन माता यशोदा अपने लाला को गोद में लेकर दुलार रही थीं। अचानक उन्हें लगा कि बालक का भार बढ़ता जा रहा है, मानो कोई पर्वत उनकी गोद में हो। वे यह भार सह न सकीं और आश्चर्य से बालक को धरती पर बिठाकर भगवान का स्मरण करते हुए घर के कामों में लग गईं।
उसी समय कंस का भेजा हुआ असुर तृणावर्त एक भयंकर बवंडर का रूप लेकर गोकुल में आ पहुँचा। चारों ओर इतनी धूल उड़ी कि दिन में भी अँधेरा छा गया। किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था और आँधी की गर्जना से सब भयभीत हो गए। इसी अंधकार में वह असुर नन्हे कृष्ण को उठाकर आकाश में ले उड़ा।
जब आँधी थमी, तो यशोदा मैया ने देखा कि जहाँ उन्होंने बालक को बिठाया था, वह स्थान सूना है। वे विलाप करती हुई धरती पर गिर पड़ीं। गोपियाँ भी रोती हुई चारों ओर कन्हैया को खोजने लगीं।
उधर आकाश में तृणावर्त को लगा कि यह बालक तो पहाड़ से भी भारी होता जा रहा है। वह आगे उड़ न सका। बालकृष्ण ने अपने नन्हे हाथों से उसका गला ऐसा पकड़ा कि वह छुड़ा न सका। उसकी साँस रुक गई, आँखें बाहर निकल आईं और वह निष्प्राण होकर गोकुल की एक चट्टान पर आ गिरा। गोपियों ने देखा कि भयानक असुर का शरीर पड़ा है और उसकी छाती पर कन्हैया सुरक्षित खेल रहे हैं। वे दौड़कर बालक को उठा लाईं और यशोदा मैया की गोद में दे दिया। सबने इसे पूर्व जन्म के पुण्यों का फल और भगवान की कृपा माना।
कुछ समय बाद जब मैया दूध पिला रही थीं, तब बालक ने जम्हाई ली और माता ने उसके छोटे से मुख में आकाश, सूर्य, चंद्र, पर्वत, समुद्र सहित सारा ब्रह्मांड देखा। यह लीला बताती है कि जीवन में कितनी भी बड़ी आँधी आए, भगवान का भार अर्थात उनकी शक्ति हर अहंकारी शक्ति को धरती पर ला देती है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 7
- Place
- Gokul
- Lesson
- जीवन की आँधी कितनी भी प्रबल हो, भगवान की शक्ति हर अहंकारी शक्ति को धरती पर ला देती है।