अर्जुन और दुर्योधन का चुनाव
युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। एक ओर नारायणी सेना थी और दूसरी ओर निःशस्त्र श्रीकृष्ण, और अर्जुन ने केवल श्रीकृष्ण को चुना।
जब शांति के सारे प्रयास विफल होते दिखने लगे, तो कुरुवंश की दोनों शाखाएँ आने वाले युद्ध के लिए सहयोगी जुटाने लगीं। दुर्योधन को पता चला कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में हैं, तो वह तुरंत उनका समर्थन पाने के लिए निकल पड़ा। अर्जुन भी इसी उद्देश्य से चले, और संयोग से दोनों भाई एक ही दिन श्रीकृष्ण के महल पहुँचे।
उस समय श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे और सो रहे थे। दुर्योधन पहले भीतर गया और अपने राजसी पद के अभिमान में पलंग के सिरहाने एक सुंदर आसन पर बैठ गया। अर्जुन उसके बाद आए और विनम्रता से हाथ जोड़कर प्रभु के चरणों की ओर खड़े हो गए। जब श्रीकृष्ण ने आँखें खोलीं, तो सबसे पहले उनकी दृष्टि अर्जुन पर पड़ी। फिर उन्होंने मुड़कर दुर्योधन का भी स्वागत किया और दोनों से आने का कारण पूछा।
दुर्योधन ने झट से कहा कि वह पहले आया है, इसलिए उसकी बात पहले सुनी जाए। श्रीकृष्ण ने शांत भाव से उत्तर दिया कि भले ही दुर्योधन पहले आया हो, पर उन्होंने पहले अर्जुन को देखा है; और अर्जुन छोटे भी हैं, तथा परंपरा है कि छोटे को पहले चुनने का अवसर दिया जाए। फिर उन्होंने दोनों के सामने विकल्प रखा। एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना थी, जिसमें वीर गोप योद्धा थे। दूसरी ओर स्वयं श्रीकृष्ण अकेले थे, जो युद्ध में न शस्त्र उठाएँगे और न लड़ेंगे।
अर्जुन ने एक क्षण भी संकोच नहीं किया। उन्होंने श्रीकृष्ण को चुना। दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ, यह सोचकर कि उसे पूरी सेना मिल गई और अर्जुन ने केवल एक निःशस्त्र व्यक्ति लिया। वह संतुष्ट होकर लौटा और बलराम जी से भी सहायता माँगी, पर बलराम जी ने युद्ध से दूर रहने का निर्णय किया।
जब दोनों अकेले रह गए, तो श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर अर्जुन से पूछा कि उन्होंने ऐसे व्यक्ति को क्यों चुना जो लड़ेगा ही नहीं। अर्जुन ने कहा कि उन्हें श्रीकृष्ण के साथ के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए, और उन्होंने प्रभु से अपना सारथी बनने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने आनंद से यह स्वीकार किया। इस प्रकार पांडवों के सखा पार्थसारथी, अर्थात अर्जुन के सारथी बने, और आगे चलकर उसी रथ से भगवद्गीता का उपदेश हुआ।
यह प्रसंग एक सरल सत्य सिखाता है। दुर्योधन ने सैनिक और शस्त्र गिने, जबकि अर्जुन ने स्वयं भगवान को माँगा। जो प्रभु के चरणों में विनम्र होकर खड़ा होता है, उस पर भगवान की दृष्टि पहले पड़ती है, और जो संसार की शक्ति के बदले ईश्वर को चुनता है, उसे अंत में सब कुछ मिल जाता है।
- Source
- Mahabharata, Udyoga Parva
- Place
- Dwarka
- Lesson
- संसार की हर शक्ति से बढ़कर स्वयं भगवान को चुनो; चरणों में विनम्र भक्त पर प्रभु की दृष्टि पहले पड़ती है।