उद्धव का ब्रज-गमन और गोपियों का प्रेम
ज्ञानी उद्धव श्रीकृष्ण का संदेश लेकर ब्रज गए, पर गोपियों का विरह-प्रेम देखकर स्वयं यह सीख गए कि शुद्ध प्रेम ही सबसे ऊँची भक्ति है।
मथुरा में रहते हुए श्रीकृष्ण को ब्रज की बहुत याद आती थी। उद्धव जी उनके प्रिय सखा और मंत्री थे, बृहस्पति के शिष्य और बड़े विद्वान, और रूप में भी श्रीकृष्ण जैसे ही दिखते थे। एक दिन श्रीकृष्ण ने उनका हाथ पकड़कर कहा कि ब्रज जाओ, मेरे माता-पिता को सांत्वना दो और उन गोपियों तक मेरा संदेश पहुँचाओ जिन्होंने अपना पूरा मन मुझे सौंप दिया है।
उद्धव जी सूर्यास्त के समय नंद गाँव पहुँचे, जब गायें लौट रही थीं और वातावरण उनकी घंटियों और दही मथने की ध्वनि से भरा था। नंद बाबा ने उन्हें गले लगाया और आँखों में आँसू भरकर कन्हैया का समाचार पूछा, एक के बाद एक उसकी बाल-लीलाएँ याद करने लगे। यशोदा मैया चुपचाप सुनती रहीं और वात्सल्य से उनके स्तनों से दूध बहने लगा। उद्धव जी ने उन्हें बताया कि उनका पुत्र साधारण बालक नहीं, स्वयं परमेश्वर है जो सबके हृदय में निवास करता है, और वह अवश्य उनके पास लौटेगा। पूरी रात केवल श्रीकृष्ण की चर्चा में बीत गई।
सुबह गोपियों ने नंद जी के द्वार पर सुनहरा रथ देखा तो डर गईं कि कहीं अक्रूर फिर तो नहीं आ गए। जब उन्हें पता चला कि उद्धव जी श्रीकृष्ण के दूत हैं, तो वे उन्हें एकांत में ले गईं। तभी श्रीकृष्ण के ध्यान में डूबी एक गोपी ने पास मँडराते एक भौंरे को देखा और उसे प्रियतम का दूत मानकर उससे बातें करने लगी। उसने भौंरे को चापलूसी के लिए डाँटा और श्रीकृष्ण को चंचल कहा, पर उसी साँस में पूछा कि क्या वे कभी ब्रज को याद करते हैं। प्रेम और उलाहने से भरे ये वचन भ्रमर गीत कहलाते हैं।
फिर उद्धव जी ने श्रीकृष्ण का संदेश सुनाया। भगवान ने कहा था कि वे उनसे कभी सचमुच दूर नहीं हैं, क्योंकि वे सबके भीतर आत्मा रूप से रहते हैं, और वे दूर इसलिए रहे कि उनका मन सदा उन्हीं में लगा रहे। गोपियों को सांत्वना मिली, पर उनकी लालसा कम नहीं हुई, क्योंकि उनकी एकमात्र इच्छा स्वयं श्रीकृष्ण की सेवा थी।
उद्धव जी कई महीने ब्रज में रहे और उनका ज्ञान भक्ति में पिघल गया। उन्होंने कहा कि वन में रहने वाली इन सरल स्त्रियों ने वह लक्ष्य पा लिया है जिसे ऋषि लंबी तपस्या से खोजते हैं। उन्होंने प्रार्थना की कि वृंदावन में कोई झाड़ी, लता या छोटी सी औषधि बनकर जन्म मिले, ताकि गोपियों के चरणों की धूल उन पर पड़ सके। ब्रज की रज को प्रणाम करके वे नंद जी के उपहार और बदले हुए हृदय के साथ मथुरा लौटे।
यह लीला सिखाती है कि ज्ञान तभी पूर्ण होता है जब वह प्रेम बन जाए, और जो प्रेम अपने लिए कुछ नहीं चाहता वही सबसे ऊँची भक्ति है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 46–47
- Place
- Mathura – Nandagaon – Vrindavan
- Lesson
- ज्ञान तभी पूर्ण होता है जब वह निःस्वार्थ प्रेम बन जाए।