भगवद् गीता वर्ल्ड

शकट भंजन लीला

उत्सव के दिन छकड़े के नीचे सोए नन्हे कन्हैया ने अपने कोमल चरणों से ऐसा प्रहार किया कि भारी छकड़ा उलटकर टूट गया और उसमें छिपे असुर का अंत हो गया।

गोकुल में नंद बाबा के घर आनंद का वातावरण था। नन्हे कृष्ण ने पहली बार करवट ली थी, और उसी दिन उनके जन्म-नक्षत्र का शुभ योग भी था। माता यशोदा ने इस अवसर पर उत्थान उत्सव का आयोजन किया। गाँव की स्त्रियाँ मंगल गीत गा रही थीं, ब्राह्मण वेद मंत्रों से आशीर्वाद दे रहे थे और यशोदा मैया ने अपने लाला को स्नान कराकर सुंदर वस्त्र-आभूषण पहनाए।

जब बालक की आँखें नींद से भारी होने लगीं, तो माता ने उसे आँगन में खड़े एक बड़े छकड़े की छाया में धीरे से सुला दिया। उस छकड़े पर दूध, दही और मक्खन से भरे पीतल और मिट्टी के अनेक पात्र रखे थे। फिर यशोदा जी अतिथियों के सत्कार में लग गईं।

कुछ देर बाद कन्हैया जागे और दूध के लिए रोने लगे। उत्सव के कोलाहल में माता उनकी पुकार न सुन सकीं। तब बालक ने रोते-रोते अपने नन्हे लाल चरण ऊपर उछाले। उन कोमल चरणों का स्पर्श होते ही विशाल छकड़ा उलट गया, उसके पहिए और धुरा टूट गए और ऊपर रखे सारे पात्र चूर-चूर होकर बिखर गए। भागवत के टीकाकारों और लोक परंपरा के अनुसार उस छकड़े में कंस का भेजा हुआ शकटासुर नामक असुर छिपा था, जिसका उसी क्षण अंत हो गया।

धमाका सुनकर सब दौड़े आए और आश्चर्य से पूछने लगे कि यह कैसे हुआ। पास खेल रहे बालकों ने कहा कि इस नन्हे शिशु ने ही पैर मारकर छकड़ा उलट दिया है। बड़े लोग इस बात पर विश्वास न कर सके, क्योंकि उन्हें बालक की दिव्यता का ज्ञान नहीं था। यशोदा मैया ने घबराकर बालक को गोद में उठाया, ब्राह्मणों से शांति पाठ करवाया और प्रेम से उसे दूध पिलाया।

यह लीला बताती है कि भगवान का एक हल्का-सा स्पर्श भी बड़े से बड़े संकट और बोझ को उलट सकता है। जो उनकी शरण में है, उसके जीवन का भार वे स्वयं हल्का कर देते हैं।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 7
Place
Gokul
Lesson
भगवान का एक हल्का-सा स्पर्श भी जीवन के बड़े से बड़े बोझ और संकट को उलट सकता है।

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