भगवद् गीता वर्ल्ड

वेणु गीत

शरद ऋतु में श्रीकृष्ण की बाँसुरी की तान ने गोपियों, गौओं, नदियों, हिरणों, पक्षियों और देवताओं तक को मोहित कर दिया; यह तान आत्मा के लिए परमात्मा की पुकार है।

शरद ऋतु आई। वृंदावन के सरोवर निर्मल जल और खिले कमलों से भर गए, और वन फूलों की सुगंध से महक उठा। ऐसे सुहावने समय में श्रीकृष्ण गौओं और सखाओं के साथ वन में गए। उनके सिर पर मोर-पंख का मुकुट था, कानों में कनेर के फूल, शरीर पर सुनहरा पीताम्बर और गले में वैजयंती माला। उन्होंने अपने अधरों पर बाँसुरी रखी और ऐसी मधुर तान छेड़ी कि सारा व्रज उसमें डूब गया।

घरों में बैठी गोपियों ने वह तान सुनी और एक-दूसरे से उसकी महिमा कहने लगीं। एक बोली कि आँखों का सबसे बड़ा फल यही है कि वे गौएँ चराते हुए श्यामसुंदर के दर्शन करें। दूसरी बोली कि इस बाँस की बाँसुरी ने न जाने कौन-सा तप किया है कि यह प्रभु के अधरों का अमृत पीती है।

गोपियों ने देखा कि बाँसुरी का प्रभाव सारे जगत पर है। नदियाँ उस तान को सुनकर अपनी लहरों में भँवर बनाकर प्रेम प्रकट करती हैं और कमल के फूल भेंट करती हैं। वन के हिरण अपने परिवार सहित प्रेम भरी दृष्टि से उन्हें निहारते हैं। गौएँ कान खड़े करके उस अमृत को पीती हैं, उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बहते हैं, और बछड़े मुँह में दूध लिए रुक जाते हैं, न निगलते हैं न छोड़ते हैं। पक्षी डालियों पर आँखें मूँदकर ऐसे बैठ जाते हैं, मानो मौन मुनि ध्यान कर रहे हों। आकाश में विमानों में बैठी देवांगनाएँ भी मोहित हो जाती हैं। बादल धूप से प्रभु की रक्षा के लिए छाया बनकर चलते हैं, और गोवर्धन पर्वत अपनी घास, जल और कंदराओं से उनकी सेवा करता है। चलने वाले स्थिर हो जाते हैं और वृक्ष पुलकित होकर मधु बहाने लगते हैं।

संत बताते हैं कि यह बाँसुरी भगवान की वह पुकार है जो हर आत्मा को अपने घर, अपने मूल प्रेम की ओर बुलाती है। बाँसुरी स्वयं खोखली है, इसलिए प्रभु का स्वर उसमें से बह पाता है। जो भक्त अपने अहंकार से खाली हो जाता है, उसके जीवन से भी भगवान का संगीत बहने लगता है।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 21
Place
Forests of Vrindavan
Lesson
बाँसुरी की तान आत्मा के लिए परमात्मा की पुकार है; जो अहंकार से खाली होता है, उसमें से भगवान का संगीत बहता है।

इसी श्रेणी में और – कृष्ण लीला