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मथुरा प्रवेश: धोबी, जुलाहा, माली और कुब्जा

मथुरा की गलियों में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण ने अहंकारी धोबी को दंड दिया और जुलाहे, माली सुदामा तथा कुब्जा की सेवा स्वीकार कर उन्हें धन्य कर दिया।

अक्रूर जी के साथ वृंदावन से आकर श्रीकृष्ण और बलराम ने ग्वालों को नगर के बाहर एक उपवन में ठहराया और स्वयं अपने सखाओं के साथ मथुरा की शोभा देखने नगर में चले। मथुरा की स्त्रियों ने ब्रज के साँवले कन्हैया की अनगिनत कथाएँ सुन रखी थीं। वे अपने अधूरे काम छोड़कर छज्जों और छतों पर आ गईं और दोनों भाइयों पर फूल बरसाने लगीं।

राजमार्ग पर उन्हें एक धोबी मिला जो राजा कंस के लिए धोए और रंगे हुए सुंदर वस्त्र लेकर जा रहा था। श्रीकृष्ण ने विनम्रता से उससे कुछ उचित वस्त्र माँगे और कहा कि उसका कल्याण होगा। राजा की सेवा के घमंड में चूर धोबी ने उन्हें जंगलों और पहाड़ों में घूमने वाले ग्वाले कहकर उनका उपहास किया और धमकाया कि जान प्यारी हो तो यहाँ से चले जाओ। तब श्रीकृष्ण ने अपने हाथ के अगले भाग से उस पर प्रहार किया और वह निष्प्राण होकर गिर पड़ा। उसके साथी वस्त्र छोड़कर भाग गए और दोनों भाइयों तथा सखाओं ने मनचाहे वस्त्र धारण किए।

यह देखकर एक जुलाहा प्रसन्न होकर आगे आया। उसने बड़ी कुशलता से दोनों भाइयों को वस्त्रों के ऐसे आभूषणों से सजाया जो उन पर बहुत सुंदर लगे। उसकी प्रेम भरी सेवा से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उसे इस जीवन में समृद्धि और देह छूटने के बाद भगवान का सान्निध्य मिलने का आशीर्वाद दिया।

फिर वे सुदामा नाम के एक माली के घर गए। यह वे ब्राह्मण सखा सुदामा नहीं थे जिनकी कथा बाद में आती है। माली ने दंडवत प्रणाम किया, चरण धोए और अपने हाथों से गूँथी सुगंधित मालाएँ अर्पित कीं। श्रीकृष्ण ने उससे वर माँगने को कहा। सुदामा माली ने केवल भगवान के प्रति अटल भक्ति, भक्तों से मित्रता और सब प्राणियों पर दया माँगी। श्रीकृष्ण ने यह वर देकर साथ ही उसके परिवार को बल, आयु, यश और धन का आशीर्वाद भी दिया।

आगे चलकर उन्हें एक युवती मिली जिसका शरीर तीन जगह से टेढ़ा था, इसलिए लोग उसे त्रिवक्रा या कुब्जा कहते थे। वह राजा के लिए चंदन का लेप ले जा रही थी। श्रीकृष्ण ने हँसते हुए पूछा कि यह उत्तम लेप किसके लिए है, तो उनकी मधुरता पर मुग्ध होकर उसने सबसे अच्छा चंदन दोनों भाइयों को लगा दिया। इस सेवा का फल देने के लिए श्रीकृष्ण ने अपने पैरों से उसके पंजे दबाए, दो उँगलियों से उसकी ठोड़ी पकड़ी और धीरे से उसे ऊपर उठाया। पल भर में उसका टेढ़ा शरीर सीधा और सुंदर हो गया। प्रेम से भरकर उसने उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया, और श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर कहा कि मथुरा का कार्य पूरा होने पर वे अवश्य आएँगे।

इसके बाद दोनों भाई उस यज्ञशाला की ओर बढ़े जहाँ महान धनुष रखा था, और वहीं से कंस के अंत की घटनाएँ आरंभ हुईं।

यह लीला सिखाती है कि भगवान पद या रूप नहीं देखते। अहंकार उनकी कृपा का द्वार बंद कर देता है, जबकि प्रेम से दी गई छोटी सी भेंट भी वे स्वीकार करते हैं और उसका हज़ार गुना फल लौटाते हैं।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 41–42
Place
Mathura
Lesson
अहंकार कृपा का द्वार बंद करता है, पर प्रेम से दी गई छोटी भेंट भी भगवान स्वीकार करते हैं।

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