स्यमंतक मणि की कथा
सूर्यदेव की दी हुई स्यमंतक मणि के खोने पर श्रीकृष्ण पर झूठा कलंक लगा, जिसे मिटाने के लिए उन्होंने जांबवान की गुफा से मणि वापस लाई।
द्वारका के यादव सत्राजित सूर्यदेव के भक्त थे। उनसे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें तेजस्वी स्यमंतक मणि दी, जो सूर्य के समान चमकती थी और जहाँ उसकी पूजा होती, वहाँ धन-धान्य बढ़ता और कोई अनिष्ट नहीं होता था। जब सत्राजित उसे पहनकर द्वारका आए, तो लोगों को पहले लगा कि स्वयं सूर्यदेव पधार रहे हैं।
एक बार श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि ऐसी मणि सबके कल्याण के लिए राजा उग्रसेन के पास रहनी चाहिए। लोभ के कारण सत्राजित ने मना कर दिया। कुछ समय बाद उनके भाई प्रसेन वह मणि पहनकर शिकार के लिए वन में गए। वहाँ एक सिंह ने उन्हें मार डाला और चमकती मणि ले ली। फिर उस सिंह को ऋक्षराज जांबवान ने मार डाला, जो मणि को अपनी गुफा में ले गए और अपने बालक को खिलौने के रूप में दे दी।
जब प्रसेन नहीं लौटे, तो सत्राजित कानाफूसी करने लगे कि मणि के लिए श्रीकृष्ण ने मेरे भाई को मार डाला। यह अफ़वाह पूरी द्वारका में फैल गई। अपने ऊपर लगे कलंक को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण कुछ नगरवासियों के साथ वन में गए, प्रसेन के चिह्नों का पीछा किया, उनका शव और मरा हुआ सिंह पाया, और अंत में एक अँधेरी गुफा के द्वार पर पहुँचे। साथियों को बाहर छोड़कर वे अकेले भीतर गए।
भीतर जांबवान उन्हें पहचान न सके और युद्ध के लिए झपटे। श्रीमद्भागवत के अनुसार दोनों में अट्ठाईस दिन तक युद्ध हुआ। अंत में बलशाली जांबवान थक गए और समझ गए कि ऐसा बल केवल उनके आराध्य प्रभु श्रीराम में ही हो सकता है। उन्होंने प्रणाम किया, और श्रीकृष्ण ने प्रेम से उन्हें स्पर्श किया। जांबवान ने आनंद से मणि लौटा दी और अपनी पुत्री जांबवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया।
श्रीकृष्ण जांबवती और मणि के साथ द्वारका लौटे और राजसभा में मणि सत्राजित को सौंप दी। अपने झूठे आरोप पर अत्यंत लज्जित होकर सत्राजित ने मणि के साथ अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से करने का प्रस्ताव रखा। श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को स्वीकार किया, पर मणि सत्राजित को ही लौटा दी।
इस कथा से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोक-मान्यता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) के दिन कहा जाता है कि जो चंद्रमा के दर्शन करता है, उस पर श्रीकृष्ण की तरह झूठा कलंक लग सकता है; और स्यमंतक मणि की कथा सुनने या पढ़ने से वह दोष दूर होता है, ऐसा माना जाता है। इस परंपरा के बारे में किसी का भी मत हो, कथा यह सिखाती है कि सही कर्म से प्रकट हुआ सत्य किसी भी मणि से अधिक चमकता है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 56–57
- Place
- Dwarka – Jambavan's cave
- Lesson
- झूठे आरोप का सबसे अच्छा उत्तर क्रोध नहीं, बल्कि धैर्य और सत्यपूर्ण कर्म है।