भीष्म पितामह और श्रीकृष्ण
शस्त्र न उठाने का वचन देने वाले श्रीकृष्ण अपने भक्त भीष्म का वचन रखने के लिए चक्र लेकर उनकी ओर दौड़े। शरशय्या पर लेटे भीष्म ने प्रभु की स्तुति की और युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम दिया।
युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने घोषणा की थी कि वे कोई शस्त्र नहीं उठाएँगे। कुरुवंश के पितामह और श्रीकृष्ण के महान भक्त भीष्म कौरव सेना के सेनापति थे। लोक परंपरा के अनुसार भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि वे श्रीकृष्ण को रणभूमि में शस्त्र उठाने पर विवश कर देंगे।
दिन-प्रतिदिन भीष्म के बाणों से पांडव सेना काँप उठी। अर्जुन अपने पितामह के प्रति प्रेम और आदर के कारण नरमी से लड़ रहे थे। यह देखकर श्रीकृष्ण रथ से कूद पड़े और भीष्म की ओर दौड़े। महाभारत में वर्णन है कि उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया; लोक परंपरा और चित्रों में उन्हें प्रायः रथ का पहिया उठाए दिखाया जाता है। भीष्म ने धनुष नीचे रख दिया और हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया, यह कहते हुए कि प्रभु के हाथों गिरना ही उनका सबसे बड़ा सौभाग्य होगा। अर्जुन श्रीकृष्ण के पीछे दौड़े, उनके चरण पकड़ लिए और पूरी शक्ति से लड़ने का वचन देकर उन्हें लौटने की विनती की। श्रीकृष्ण रथ पर लौट आए।
श्रीमद्भागवत में भीष्म बाद में इस क्षण को आश्चर्य से याद करते हैं: प्रभु ने अपने भक्त की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए अपनी प्रतिज्ञा छोड़ दी। भक्त का वचन रहे, इसके लिए श्रीकृष्ण को वचन तोड़ने वाला कहलाना भी स्वीकार था।
दसवें दिन भीष्म गिरे और शरशय्या पर लेट गए। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। युद्ध के बाद श्रीकृष्ण युधिष्ठिर और पांडवों को उनके पास लेकर आए। श्रीकृष्ण को निहारते हुए भीष्म ने सुंदर स्तुति की, अर्जुन के सारथी रूप में प्रभु का स्मरण किया, और प्रार्थना की कि अंत समय में उनका मन केवल प्रभु में ही टिका रहे।
श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म और सभी के कर्तव्यों का उपदेश दिया। जब युधिष्ठिर ने पूछा कि वह एक परम देव कौन है, जिसकी स्तुति करके मनुष्य शांति पाता है, तब भीष्म ने उन्हें विष्णु सहस्रनाम, अर्थात भगवान विष्णु के हजार नाम दिए, जिनका पाठ भक्त आज भी करते हैं। फिर श्रीकृष्ण पर दृष्टि टिकाए हुए भीष्म ने देह त्याग दी।
यह लीला भगवान और भक्त के कोमल संबंध को दिखाती है। भगवान अपने भक्त की रक्षा करते हैं, भक्त के वचन को अपने वचन से ऊपर रखते हैं, और विदा की घड़ी में उसे अपने दर्शन की कृपा देते हैं।
- Source
- Mahabharata, Bhishma Parva, Shanti Parva and Anushasana Parva; Shrimad Bhagavatam, Canto 1, ch. 9
- Place
- Kurukshetra
- Lesson
- भगवान भक्त के वचन को अपने वचन से ऊपर रखते हैं और अंतिम घड़ी में उसे अपने दर्शन देते हैं।