नरकासुर वध और सोलह हज़ार राजकुमारियों की मुक्ति
सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर श्रीकृष्ण ने प्राग्ज्योतिषपुर में मुर और नरकासुर का अंत किया और बंदी सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियों को सम्मान दिया।
नरकासुर, जो पृथ्वी देवी भूमि का पुत्र होने के कारण भौमासुर भी कहलाता था, प्राग्ज्योतिषपुर से राज करता था। शक्ति के मद में चूर होकर वह तीनों लोकों को सताने लगा। उसने वरुण देव का राजछत्र छीन लिया, देवताओं का एक पर्वत-शिखर हथिया लिया, और देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल भी छीन लिए। सबसे बुरा यह कि उसने अनेक राज्यों की हज़ारों राजकुमारियों का हरण करके उन्हें अपने महल में बंदी बना रखा था। इंद्र द्वारका आए और श्रीकृष्ण से सहायता की प्रार्थना की।
श्रीकृष्ण गरुड़ पर सवार हुए और सत्यभामा को भी साथ ले गए। प्राग्ज्योतिषपुर पर्वतों, शस्त्रों, जल, अग्नि और वायु के घेरों से और मुर दैत्य के भयानक पाशों से सुरक्षित था। श्रीकृष्ण ने गदा से पर्वतों की दीवारें तोड़ीं, बाणों से शस्त्रों को, चक्र से अग्नि, जल और वायु को, और तलवार से पाशों को काट डाला। जब उन्होंने पांचजन्य शंख बजाया तो पाँच सिरों वाला मुर जल से निकलकर उन पर टूट पड़ा। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसके पाँचों सिर काट दिए। मुर का वध करने के कारण भगवान मुरारी कहलाते हैं। मुर के पुत्र भी युद्ध में मारे गए।
तब नरकासुर स्वयं हाथी पर सवार होकर सेना सहित निकला। घोर युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। लोक-परंपरा के अनुसार इस युद्ध में सत्यभामा ने भी श्रीकृष्ण के साथ वीरता से युद्ध किया था। फिर भूमि देवी अदिति के कुंडल और अन्य रत्न लेकर भगवान के सामने आईं, स्तुति की और नरकासुर के पुत्र भगदत्त की रक्षा की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने बालक को अभय और राज्य दिया।
महल में प्रवेश करने पर श्रीकृष्ण को सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियाँ मिलीं। उन्हें देखते ही प्रत्येक ने मन ही मन उन्हें पति रूप में वरण कर लिया। यह जानकर कि बंदी रहने के कारण समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्मान के साथ द्वारका भेजा और बाद में सबसे विवाह किया, हर एक को अलग महल दिया, ताकि कोई कभी उन्हें हीन दृष्टि से न देख सके। इसके बाद श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और अदिति को उनके कुंडल लौटाए।
लोक-परंपरा में नरकासुर के अंत का दिन दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी के रूप में याद किया जाता है। गुजरात में इसे काली चौदस कहते हैं, जब परिवार बुराई और भय से रक्षा की प्रार्थना करते हैं और अंधकार पर प्रकाश की विजय के प्रतीक रूप में दीये जलाए जाते हैं।
यह लीला सिखाती है कि भगवान केवल बुराई का नाश ही नहीं करते, बल्कि उससे पीड़ित लोगों को उनका सम्मान भी लौटाते हैं, और सच्ची रक्षा में आदर और अपनापन भी शामिल है।
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 59
- Place
- Dwarka – Pragjyotishapura
- Lesson
- भगवान बुराई का नाश ही नहीं करते, पीड़ितों को उनका सम्मान भी लौटाते हैं।