भगवद् गीता वर्ल्ड

वसुदेव जी का यमुना पार गमन

तूफानी रात में वसुदेव जी नवजात कृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल पहुँचे, जहाँ शेषनाग ने छत्र बनकर प्रभु की रक्षा की।

शिशु रूप धारण करने से पहले भगवान ने वसुदेव जी को आदेश दिया था कि मुझे गोकुल में नंद बाबा के घर पहुँचा दो और वहाँ यशोदा जी की नवजात कन्या को यहाँ ले आओ। जैसे ही वसुदेव जी ने बालक को उठाया, योगमाया के प्रभाव से पहरेदार गहरी नींद में सो गए, हाथ-पैरों की बेड़ियाँ खुल गईं और कारागार के भारी द्वार अपने आप खुल गए।

बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी, बिजली कड़क रही थी और बादल गरज रहे थे। वसुदेव जी ने बालक को एक टोकरी में रखा और सिर पर उठाकर चल पड़े। तभी शेषनाग जी पीछे-पीछे आए और अपने फन फैलाकर प्रभु पर छत्र बन गए, ताकि एक बूँद भी उन्हें न छू सके।

यमुना जी उस रात भयंकर रूप से उफन रही थीं। श्रीमद्भागवत के अनुसार जैसे समुद्र ने श्रीराम को मार्ग दिया था, वैसे ही यमुना जी ने भी वसुदेव जी को मार्ग दे दिया। लोक परंपरा में यह भी कहा जाता है कि यमुना जी का जल बढ़ता ही गया, मानो वे अपने प्रभु के चरण छूना चाहती हों, और जैसे ही बालकृष्ण ने अपना नन्हा चरण टोकरी से बाहर निकालकर जल को स्पर्श कराया, जल उतर गया और मार्ग बन गया।

गोकुल में सब सो रहे थे। उसी रात यशोदा जी ने योगमाया को कन्या रूप में जन्म दिया था, पर वे भी गहरी नींद में थीं। वसुदेव जी ने चुपचाप बालक को यशोदा जी के पास लिटा दिया, कन्या को उठाया और मथुरा लौट आए। कारागार में पहुँचते ही बेड़ियाँ फिर बंद हो गईं और द्वार फिर लग गए।

कन्या के रोने की आवाज़ सुनकर पहरेदार जागे और कंस को सूचना दी। देवकी जी ने विनती की कि यह तो कन्या है, इसे छोड़ दो, पर कंस ने उसे छीनकर पत्थर पर पटकना चाहा। वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में पहुँच गई और अष्टभुजा देवी के रूप में प्रकट होकर बोली, अरे मूर्ख, तुझे मारने वाला तो कहीं और जन्म ले चुका है। यह सुनकर कंस भय और चिंता से भर गया।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10, ch. 3–4
Place
Mathura to Gokul
Lesson
जो भगवान को अपने सिर पर धारण करता है, उसके लिए हर बंधन खुल जाता है और हर बाधा मार्ग दे देती है।

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