भगवद् गीता वर्ल्ड

अच्युत — जो कभी च्युत नहीं होते

"अच्युत" का अर्थ है जो अपने स्वरूप, वचन और भक्तों से कभी नहीं डिगते। गीता में अर्जुन रथ को सेनाओं के बीच ले जाने की प्रार्थना इसी नाम से करते हैं।

"च्युत" का अर्थ है गिरा हुआ या डिगा हुआ, और "अच्युत" का अर्थ है जो कभी नहीं गिरता। संसार की हर वस्तु बदलती है, हर जीव कभी न कभी अपने स्थान से च्युत होता है, पर भगवान का स्वरूप, उनकी शक्ति और उनका ज्ञान सदा एक-सा रहता है। परंपरा में इसका एक कोमल अर्थ भी है — वे अपनी शरण में आए भक्त को कभी गिरने नहीं देते।

भगवद्गीता में अर्जुन पहले अध्याय में कहते हैं, "हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए।" यह एक सुंदर विरोधाभास है — जो अच्युत हैं, अविचल हैं, वही प्रेमवश सारथी बनकर भक्त की आज्ञा मान रहे हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन क्षमा माँगते हुए भी इसी नाम का प्रयोग करते हैं, और गीता के अंत (18.73) में कहते हैं, "हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई।"

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला "अच्युताष्टकम्" भक्तों में बहुत प्रिय है। विष्णु सहस्रनाम में भी अच्युत नाम आता है। परंपरा में "अच्युत, अनंत, गोविन्द" इन तीन नामों के जप को रोगों और कष्टों से रक्षा करने वाला माना गया है।

Name Sa
अच्युत
Name Roman
Achyuta
Meaning
जो कभी च्युत नहीं होते और भक्त को गिरने नहीं देते
Gita Refs
1.21, 11.42, 18.73

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