भगवद् गीता वर्ल्ड

मुकुंद — मुक्ति और भक्ति के दाता

"मुकुंद" का अर्थ है मुक्ति प्रदान करने वाले। कुलशेखर आलवार की "मुकुंदमाला" जैसे स्तोत्र इसी नाम की महिमा गाते हैं।

परंपरा के अनुसार "मुकुंद" शब्द "मुक्ति" और "दा" (देने वाला) के भाव से जुड़ा है — वे जो जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति देते हैं। भक्त आचार्य इसका एक और सुंदर अर्थ बताते हैं कि मुकुंद ऐसी भक्ति देते हैं जिसके सामने स्वयं मुक्ति भी छोटी लगने लगती है।

श्रीमद्भागवत में यह नाम बार-बार आता है, विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ भक्त भगवान के चरणों की शरण की बात करते हैं। भागवत का संदेश है कि जो व्यक्ति मुकुंद के चरणों की पूर्ण शरण ले लेता है, वह किसी और ऋण या बंधन के अधीन नहीं रहता। ब्रज की गोपियाँ और उद्धव जैसे भक्त भी भगवान को इसी प्रेम से पुकारते हैं।

दक्षिण भारत के राजा और संत कुलशेखर आलवार ने "मुकुंदमाला स्तोत्र" की रचना की, जिसमें वे बार-बार प्रार्थना करते हैं कि जन्म-जन्मांतर तक उनका मन मुकुंद के चरणों में लगा रहे; वे स्वर्ग या राज्य नहीं, केवल प्रभु का स्मरण माँगते हैं। "मुकुंद माधव गोविन्द बोल" जैसे संकीर्तन आज भी मंदिरों और घरों में गाए जाते हैं। यह नाम भक्त को याद दिलाता है कि सच्ची स्वतंत्रता भगवान की शरण में ही है।

Name Sa
मुकुन्द
Name Roman
Mukunda
Meaning
मुक्ति प्रदान करने वाले
Source
Shrimad Bhagavatam; Mukundamala Stotra of Kulashekhara Alvar

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