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श्रीनाथजी — नाथद्वारा के गोवर्धनधारी प्रभु

श्रीनाथजी श्रीकृष्ण का वह स्वरूप हैं जिसमें वे बायाँ हाथ उठाकर गोवर्धन धारण किए हुए हैं। पुष्टिमार्ग के प्रधान आराध्य के रूप में वे राजस्थान के नाथद्वारा में विराजते हैं।

"श्रीनाथ" का अर्थ है श्री अर्थात लक्ष्मी के नाथ, और प्रेम से "जी" जोड़कर भक्त उन्हें श्रीनाथजी कहते हैं। ब्रज में उन्हें श्री गोवर्धननाथजी भी कहा जाता था। उनका स्वरूप सात वर्ष के उस बालक का है जिसने बायाँ हाथ ऊपर उठाकर गोवर्धन धारण किया है और दाहिना हाथ कमर पर टिका रखा है।

पुष्टिमार्ग की परंपरा के अनुसार यह स्वरूप गोवर्धन पर्वत से स्वयं प्रकट हुआ — पहले उठी हुई भुजा के दर्शन हुए और बाद में मुखारविंद के। श्री वल्लभाचार्य जी ने गोवर्धन पर इनकी सेवा की व्यवस्था की, और उनके पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी) ने सेवा की विस्तृत परंपरा स्थापित की, जिसमें सूरदास जी सहित अष्टछाप के कवि कीर्तन करते थे। परंपरा के अनुसार मुगल काल में संकट आने पर स्वरूप को ब्रज से रथ में ले जाया गया, और मेवाड़ के सिंहाड़ गाँव में रथ का पहिया धँस गया। इसे प्रभु की इच्छा मानकर वहीं मंदिर बना, जो आज नाथद्वारा कहलाता है।

नाथद्वारा की हवेली में दिन भर में आठ दर्शन होते हैं — मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती और शयन। ऋतु के अनुसार वस्त्र, शृंगार, भोग और पिछवाई बदलती है। अन्नकूट उत्सव यहाँ विशेष भव्यता से मनाया जाता है।

Name Sa
श्रीनाथजी
Name Roman
Shrinathji
Meaning
श्री (लक्ष्मी) के नाथ; नाथद्वारा में पूजित गोवर्धनधारी स्वरूप
Source
Pushtimarg (Vallabha sampradaya) tradition

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