गोपाल — गौओं के रक्षक बालकृष्ण
"गोपाल" वह नाम है जो ब्रज के ग्वालबाल कृष्ण की याद दिलाता है, जो गायें चराते और उनकी रक्षा करते थे। घर-घर में पूजे जाने वाले लड्डू गोपाल इसी रूप के प्रतीक हैं।
"गोपाल" का अर्थ है "गो" अर्थात गौओं का "पाल" अर्थात पालन और रक्षा करने वाला। नंद बाबा का परिवार गोप समाज का था, जिसकी संपत्ति और जीवन गौएँ ही थीं। श्रीकृष्ण इसी वातावरण में पले और बचपन से ही गोपाल कहलाए।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णन है कि पहले कृष्ण और बलराम बछड़े चराते थे और बड़े होने पर गायें चराने वन में जाने लगे। परंपरा के अनुसार जिस दिन उन्होंने पहली बार गायें चराना आरंभ किया, उसकी स्मृति में कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी मनाई जाती है। वन में वे मुरली बजाकर गायों को नाम लेकर बुलाते, ग्वालबालों के साथ भोजन बाँटते और अघासुर, बकासुर जैसे असुरों से सबकी रक्षा करते थे।
भक्ति में गोपाल नाम वात्सल्य भाव से जुड़ा है। लड्डू गोपाल या बालगोपाल के रूप में भगवान को घर का बालक मानकर स्नान, शृंगार, भोग और शयन की सेवा की जाती है। "गोपाल सहस्रनाम" और गोपाल मंत्रों का जप भी प्रचलित है। गौसेवा को भी गोपाल की प्रसन्नता का मार्ग माना जाता है, क्योंकि वे स्वयं गौओं के प्रेमी हैं।
- Name Sa
- गोपाल
- Name Roman
- Gopala
- Meaning
- गौओं के पालक और रक्षक
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10