पार्थसारथि — अर्जुन के सारथी
कुरुक्षेत्र के युद्ध में शस्त्र न उठाने का व्रत लेकर अर्जुन का रथ चलाने वाले श्रीकृष्ण "पार्थसारथि" कहलाते हैं। इसी रथ पर उन्होंने भगवद्गीता का उपदेश दिया।
"पार्थ" अर्जुन का नाम है, क्योंकि वे पृथा अर्थात कुंती के पुत्र थे। "सारथि" का अर्थ है रथ चलाने वाला। पार्थसारथि वे हैं जिन्होंने स्वयं अपने भक्त और सखा का रथ हाँका। तीनों लोकों के स्वामी का एक मनुष्य के सारथी बनना भक्ति के इतिहास का एक अद्भुत दृश्य है।
महाभारत के उद्योग पर्व के अनुसार युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने एक ओर अपनी विशाल नारायणी सेना और दूसरी ओर स्वयं को, निःशस्त्र और युद्ध न करने वाले के रूप में, रखा। अर्जुन ने बिना संकोच अकेले कृष्ण को चुना, और दुर्योधन सेना पाकर प्रसन्न हुआ। इसके बाद भगवान अर्जुन के सारथी बने। युद्ध के आरंभ में, दोनों सेनाओं के बीच, इसी रथ पर बैठे-बैठे उन्होंने मोहग्रस्त अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया।
चेन्नई के तिरुवल्लिकेणी (ट्रिप्लिकेन) का पार्थसारथि मंदिर प्रसिद्ध दिव्य देशम है, जहाँ परंपरा के अनुसार भगवान के मुख पर भीष्म के बाणों के चिह्न दिखाए जाते हैं। रथ पर बैठे कृष्ण और हाथ जोड़े अर्जुन का चित्र गीता का सबसे परिचित चित्र है। यह नाम सिखाता है कि जो जीवन की बागडोर भगवान को सौंप देता है, उसका मार्ग वे स्वयं संभालते हैं।
- Name Sa
- पार्थसारथि
- Name Roman
- Parthasarathi
- Meaning
- पार्थ (अर्जुन) के सारथी
- Source
- Mahabharata, Udyoga Parva; Bhagavad Gita, ch. 1