वासुदेव — वसुदेव-नंदन, सर्वव्यापी प्रभु
"वासुदेव" का अर्थ है वसुदेव जी के पुत्र, और वह परमात्मा जो सब प्राणियों में वास करता है। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का द्वादशाक्षर मंत्र इसी नाम पर आधारित है।
"वासुदेव" नाम के दो स्तर हैं। ऐतिहासिक रूप से श्रीकृष्ण वसुदेव जी और देवकी जी के पुत्र हैं, इसलिए वे वासुदेव कहलाते हैं। कंस के कारागार में जन्म लेने के बाद वसुदेव जी ही उन्हें उफनती यमुना पार करके गोकुल ले गए थे। दार्शनिक रूप से "वसु" का अर्थ है वास करना, अतः वासुदेव वह परमात्मा है जो सारे जगत में व्याप्त है और जिसमें सारा जगत वास करता है।
भगवद्गीता में भगवान स्वयं कहते हैं कि अनेक जन्मों के बाद ज्ञानी यह जानकर उनकी शरण लेता है कि "सब कुछ वासुदेव ही है", और ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है (7.19)। दसवें अध्याय में वे कहते हैं कि वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ। गीता के अंत में संजय भी इसी नाम से श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख करते हैं।
भक्ति में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का द्वादशाक्षर मंत्र अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार देवर्षि नारद ने बालक ध्रुव को यही मंत्र दिया था, और उसके जप से ध्रुव को भगवान के दर्शन हुए। आज भी अनेक भक्त प्रतिदिन माला पर इस मंत्र का जप करते हैं।
- Name Sa
- वासुदेव
- Name Roman
- Vasudeva
- Meaning
- वसुदेव-पुत्र; सब प्राणियों में वास करने वाले
- Source
- Bhagavad Gita 7.19, 10.37 (spoken by Krishna); Shrimad Bhagavatam, Canto 4 (Dhruva)