हृषीकेश — इन्द्रियों के स्वामी
"हृषीकेश" का अर्थ है सभी इन्द्रियों के स्वामी। गीता में संजय और अर्जुन दोनों भगवान को इस नाम से संबोधित करते हैं।
"हृषीक" का अर्थ है इन्द्रियाँ और "ईश" का अर्थ है स्वामी। हृषीकेश वे हैं जो सब प्राणियों की इन्द्रियों के स्वामी और नियंत्रक हैं। हमारी आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, पर उनकी शक्ति के मूल स्रोत भगवान ही हैं। साथ ही वे स्वयं अपनी इन्द्रियों के पूर्ण स्वामी हैं — संसार में रहते हुए भी किसी विषय के अधीन नहीं होते।
भगवद्गीता में यह नाम बड़े अर्थपूर्ण स्थानों पर आता है। पहले अध्याय में संजय बताते हैं कि हृषीकेश ने पाञ्चजन्य शंख बजाया (1.15), और फिर अर्जुन के कहने पर हृषीकेश ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा किया (1.24)। ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूप देखकर अर्जुन उन्हें हृषीकेश कहकर स्तुति करते हैं, और अठारहवें अध्याय के आरंभ में इसी नाम से संन्यास और त्याग का तत्त्व पूछते हैं।
यह नाम साधक के लिए एक संदेश भी है। गीता बार-बार इन्द्रिय-संयम की बात करती है। भक्त मानते हैं कि इन्द्रियों को केवल दबाने के बजाय उन्हें इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश की सेवा में लगा देना ही सच्चा संयम है। नारद पंचरात्र की भक्ति की परिभाषा भी यही कहती है कि इन्द्रियों द्वारा हृषीकेश की सेवा ही भक्ति है।
- Name Sa
- हृषीकेश
- Name Roman
- Hrishikesha
- Meaning
- इन्द्रियों के स्वामी
- Gita Refs
- 11.36, 18.1
- Source
- Bhagavad Gita 1.15, 1.24 (used by Sanjaya); 11.36, 18.1 (used by Arjuna)