मुरारि — मुर दैत्य के शत्रु
नरकासुर के नगर की रक्षा करने वाले पाँच सिर वाले दैत्य मुर का वध करने से श्रीकृष्ण "मुरारि" कहलाए। यह नाम भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान की वीरता का स्मरण कराता है।
"मुरारि" शब्द "मुर" और "अरि" से बना है, जिसका अर्थ है मुर नामक दैत्य के शत्रु। यह नाम द्वारका काल की एक लीला से आता है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में है।
भूमि-पुत्र नरकासुर ने बड़ा अत्याचार फैला रखा था। उसने देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और हजारों राजकुमारियों को बंदी बना रखा था। उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर पहाड़ों, शस्त्रों, जल और अग्नि की खाइयों से घिरी थी, और उसकी रक्षा पाँच सिर वाला भयंकर दैत्य मुर करता था, जिसने नगर के चारों ओर पाश बिछा रखे थे। श्रीकृष्ण सत्यभामा जी के साथ गरुड़ पर सवार होकर वहाँ पहुँचे, उन्होंने किले की बाधाएँ तोड़ीं और अपने सुदर्शन चक्र से मुर के पाँचों सिर काट दिए। इसके बाद उन्होंने नरकासुर का भी वध किया और बंदी राजकुमारियों को मुक्त किया।
भजन-कीर्तन में "मुकुंद मुरारि", "मुरारि गोविन्द" जैसे संबोधन बहुत प्रचलित हैं। भक्त इस नाम को लेते समय यह भाव रखते हैं कि जैसे भगवान ने मुर के पाश काटे, वैसे ही वे हमारे जीवन के बंधनों और भय को भी काट देंगे।
- Name Sa
- मुरारि
- Name Roman
- Murari
- Meaning
- मुर दैत्य के शत्रु
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10 (Narakasura episode)