ठाकोरजी — घर-घर के प्यारे ठाकुर
"ठाकोरजी" वह प्रेम भरा नाम है जिससे गुजराती और पुष्टिमार्गीय परिवार अपने घर में विराजमान श्रीकृष्ण स्वरूप को पुकारते हैं। उनकी सेवा घर के सबसे प्रिय सदस्य की तरह की जाती है।
"ठाकुर" का अर्थ है स्वामी या मालिक, और गुजराती में यही "ठाकोर" बन जाता है। आदर और अपनापन जोड़कर "ठाकोरजी" कहा जाता है। यह कोई अलग देवता नहीं, बल्कि वही श्रीकृष्ण हैं जिन्हें भक्त अपने घर का स्वामी मानकर अपने बीच बिठाते हैं।
श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग में "पुष्टि" का अर्थ है भगवान का अनुग्रह। इस मार्ग में घर में विराजमान स्वरूप, जो प्रायः बालकृष्ण, लालन या नवनीतप्रिय के रूप में होता है, की पूजा नहीं बल्कि "सेवा" की जाती है — जैसे कोई माँ अपने नन्हे बालक की देखभाल करती है। स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर ठाकोरजी को जगाया जाता है, शृंगार किया जाता है, घर में बना ताज़ा भोग धराया जाता है, और रात को प्रेम से सुलाया जाता है। गर्मी में हल्के वस्त्र और ठंडे भोग, सर्दी में गरम वस्त्र और पौष्टिक व्यंजन — सब कुछ ऋतु और बालक की सुविधा के अनुसार होता है।
हिंडोला, जन्माष्टमी, अन्नकूट और होली जैसे उत्सव घर में ही ठाकोरजी के साथ मनाए जाते हैं। "श्रीकृष्ण शरणं मम" इस मार्ग का प्रमुख मंत्र है और "जय श्रीकृष्ण" परस्पर अभिवादन। गुजरात में डाकोर के रणछोड़राय को भी प्रेम से "डाकोर ना ठाकोर" कहा जाता है।
- Name Sa
- ठाकोरजी
- Name Roman
- Thakorji
- Meaning
- घर के प्रिय स्वामी, प्यारे ठाकुर
- Source
- Pushtimarg (Vallabha sampradaya) household seva tradition