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गोविन्द — गौओं और इन्द्रियों को आनंद देने वाले

गोवर्धन लीला के बाद सुरभि गाय और इन्द्र ने भगवान का अभिषेक कर उन्हें "गोविन्द" नाम दिया। यह नाम गौओं, पृथ्वी और इन्द्रियों के स्वामी का बोध कराता है।

संस्कृत में "गो" शब्द के अनेक अर्थ हैं — गाय, पृथ्वी, वाणी और इन्द्रियाँ। "विन्द" का अर्थ है पाने वाला, जानने वाला या आनंद देने वाला। इसलिए गोविन्द वे हैं जो गौओं को सुख देते हैं, पृथ्वी की रक्षा करते हैं और भक्तों की इन्द्रियों को अपनी सेवा में लगाकर आनंदित करते हैं।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कथा आती है कि जब इन्द्र के कोप से ब्रज पर मूसलाधार वर्षा हुई, तब बालकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर सबकी रक्षा की। इन्द्र का अभिमान टूटा और वे क्षमा माँगने आए। उनके साथ दिव्य कामधेनु सुरभि भी आईं। सुरभि ने अपने दूध से और इन्द्र ने ऐरावत द्वारा लाए गए आकाशगंगा के जल से भगवान का अभिषेक किया और उन्हें गौओं का इन्द्र, अर्थात "गोविन्द" कहकर पुकारा।

गीता के पहले अध्याय में अर्जुन कहते हैं, "हे गोविन्द, हमें ऐसे राज्य से क्या लाभ?" भक्ति परंपरा में यह नाम अत्यंत लोकप्रिय है। आदि शंकराचार्य का "भज गोविन्दम्", जयदेव का "गीत गोविन्द", तिरुपति के तीर्थयात्रियों का "गोविन्दा गोविन्दा" का जयघोष और जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर — सब इसी नाम की महिमा गाते हैं।

Name Sa
गोविन्द
Name Roman
Govinda
Meaning
गौओं और इन्द्रियों को आनंद देने वाले
Gita Refs
1.32
Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 10 (after the Govardhan leela)

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