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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 68

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ .
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ॥

अर्थ

इसलिए हे महाबाहो! जिसकी इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से वश में (निगृहीत) कर ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है

शब्दार्थ

  • तस्मात् – इसलिए
  • यस्य – जिसकी
  • महाबाहो – हे विशाल भुजाओं वाले (अर्जुन)
  • निगृहीतानि – वश में की हुई, रोकी हुई
  • सर्वशः – सब प्रकार से, पूर्ण रूप से
  • इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ
  • इन्द्रियार्थेभ्यः – इन्द्रियों के विषयों से
  • तस्य – उसकी
  • प्रज्ञा – बुद्धि
  • प्रतिष्ठिता – स्थिर है

अन्वय

तस्मात् महाबाहो, यस्य इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशः निगृहीतानि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।

व्याख्या

‘तस्मात्’ — इसलिए। यह श्लोक इन्द्रिय-संयम के पूरे विवेचन का निष्कर्ष है। 2.58 से आरम्भ होकर श्रीकृष्ण ने इन्द्रियों के विषय में अनेक बातें कहीं — कछुए की तरह समेटना, रस का परम-दर्शन से मिटना, इन्द्रियों का प्रबल होना, मत्पर होकर संयम करना, विषय-चिन्तन से पतन की सीढ़ी, राग-द्वेष रहित विचरण से प्रसाद, और एक इन्द्रिय से भी प्रज्ञा का बह जाना। अब वे सबका सार एक वाक्य में देते हैं: जिसकी इन्द्रियाँ सब ओर से वश में हैं, उसी की प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।

ध्यान दें कि ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’ — यह वाक्यांश इस प्रकरण में बार-बार आया है: 2.57, 2.58, 2.61 और अब 2.68 में। यह एक टेक की तरह है, जैसे किसी भजन की मुख्य पंक्ति बार-बार लौटती है। इस पुनरावृत्ति से श्रीकृष्ण यह दृढ़ करते हैं कि स्थिर बुद्धि और इन्द्रिय-संयम अविभाज्य हैं। जहाँ एक है, वहाँ दूसरा भी है।

‘सर्वशः’ शब्द पिछले श्लोक की बात से सीधे जुड़ता है। 2.67 में कहा गया था कि एक भी भटकती इन्द्रिय प्रज्ञा को बहा ले जाती है; इसलिए यहाँ संयम ‘सर्वशः’ — सब इन्द्रियों का, सब प्रकार से — होना चाहिए। आचार्य शंकर कहते हैं कि यह संयम मानसिक भी है — केवल बाहरी इन्द्रियों का नहीं, मन में उठने वाली विषय-स्मृतियों का भी।

अर्जुन को ‘महाबाहो’ — महान भुजाओं वाला — कहकर सम्बोधित करना अत्यन्त सार्थक है। टीकाकार इसमें एक सुन्दर संकेत देखते हैं: हे अर्जुन, तुमने अपनी भुजाओं के बल से बाहर के अनेक शत्रुओं को जीता है; अब भीतर के शत्रुओं — इन्द्रियों और विषयों — को जीतो। सच्चा वीर वही है जो अपने आप को जीत ले। बाहरी विजय सरल है, आत्म-विजय कठिन।

जीवन में यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारी प्रतिभा, शिक्षा और सफलता तभी सार्थक हैं जब उनके साथ आत्म-संयम हो। अनेक प्रतिभाशाली लोग असंयम के कारण गिर जाते हैं। सच्ची शक्ति अपने मन और इन्द्रियों पर स्वामित्व में है।

प्रसंग

2.67 में बताया गया कि एक भटकती इन्द्रिय भी प्रज्ञा को हवा में नाव की तरह बहा ले जाती है। यह श्लोक इन्द्रिय-संयम के पूरे विषय (2.58–2.68) का निष्कर्ष है। अगले श्लोक (2.69) में श्रीकृष्ण एक अद्भुत विरोधाभास से ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि का अन्तर बताते हैं — जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागता है।

जीवन-शिक्षा

दूसरों पर विजय पाने से पहले स्वयं पर विजय पाइए। प्रतिभा और सफलता तभी टिकती हैं जब उनके साथ आत्म-संयम हो — सच्चा वीर वही है जो अपने मन का स्वामी है।

मुख्य शब्द

निग्रह
रोकना, वश में करना
महाबाहु
महान भुजाओं वाला — पराक्रमी अर्जुन
प्रतिष्ठित प्रज्ञा
दृढ़ता से स्थापित विवेक — इस प्रकरण की टेक

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