श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 57
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham .
nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ॥
अर्थ
जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, और उन-उन शुभ या अशुभ (अनुकूल या प्रतिकूल) परिस्थितियों को पाकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है — उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है
शब्दार्थ
- यः – जो
- सर्वत्र – सब जगह, सब विषयों में
- अनभिस्नेहः – अति-स्नेह (आसक्ति) से रहित
- तत् तत् – उस-उस (जो भी आए)
- प्राप्य – प्राप्त करके
- शुभ-अशुभम् – शुभ और अशुभ, अनुकूल और प्रतिकूल
- न अभिनन्दति – हर्षित होकर प्रशंसा नहीं करता
- न द्वेष्टि – द्वेष नहीं करता
- तस्य – उसकी
- प्रज्ञा – बुद्धि, विवेक
- प्रतिष्ठिता – दृढ़ता से स्थित है
अन्वय
यः सर्वत्र अनभिस्नेहः, तत् तत् शुभ-अशुभं प्राप्य न अभिनन्दति न द्वेष्टि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में सुख-दुःख के अनुभव के प्रति स्थितप्रज्ञ की आन्तरिक प्रतिक्रिया बताई गई थी। अब श्रीकृष्ण उसी बात को और गहराई से कहते हैं — शुभ और अशुभ वस्तुओं या घटनाओं के सम्पर्क में उसका व्यवहार कैसा होता है। इस श्लोक के तीन मुख्य अंग हैं: सर्वत्र अनासक्ति, हर्ष का अभाव और द्वेष का अभाव।
‘सर्वत्रानभिस्नेहः’ — वह सर्वत्र ‘अभिस्नेह’ से रहित है। यहाँ शब्द-चयन बहुत सूक्ष्म है। श्रीकृष्ण ‘स्नेह’ का नहीं, ‘अभिस्नेह’ का निषेध करते हैं — अर्थात् ऐसा चिपकने वाला लगाव जो वस्तु के बिना हमें अधूरा कर दे। स्थितप्रज्ञ प्रेम और करुणा से रहित नहीं होता; वह सबसे स्नेह करता है, पर किसी से बँधता नहीं। आचार्य शंकर इसे शरीर, जीवन और सम्बन्धियों तक के प्रति आसक्ति का अभाव बताते हैं। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता, वैसे ही वह सबके बीच रहकर भी अलिप्त रहता है।
‘तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्’ — ‘तत्-तत्’ की पुनरुक्ति बताती है कि जीवन में बारी-बारी से तरह-तरह की परिस्थितियाँ आती ही रहेंगी: कभी सम्मान, कभी अपमान; कभी लाभ, कभी हानि। ज्ञानी इनसे भागता नहीं, इन्हें प्राप्त करता है, अनुभव करता है। पर शुभ मिलने पर वह ‘नाभिनन्दति’ — उछलकर उसकी प्रशंसा नहीं करता, उसे पकड़ने को उतावला नहीं होता; और अशुभ मिलने पर ‘न द्वेष्टि’ — उससे घृणा नहीं करता, उसे कोसता नहीं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह उदासीनता जड़ता या असंवेदनशीलता नहीं है। स्थितप्रज्ञ अच्छे-बुरे का भेद भली-भाँति जानता है और उचित कर्म भी करता है। अन्तर केवल इतना है कि घटनाएँ उसकी भीतरी शान्ति की स्वामिनी नहीं रहतीं। वह परिस्थिति का उत्तर देता है, परिस्थिति के आगे प्रतिक्रिया में बह नहीं जाता।
दैनिक जीवन में इसका अभ्यास छोटी-छोटी बातों से आरम्भ हो सकता है — मौसम, यातायात, किसी की टिप्पणी। जब हम हर छोटी अनुकूलता पर फूलना और हर प्रतिकूलता पर झुँझलाना छोड़ देते हैं, तो धीरे-धीरे बड़ी घटनाओं में भी मन सन्तुलित रहने लगता है। यही प्रज्ञा की प्रतिष्ठा है।
प्रसंग
2.56 में स्थितप्रज्ञ को सुख-दुःख में अविचलित और राग-भय-क्रोध से रहित बताया गया। यह श्लोक उसी समता को शुभ-अशुभ प्राप्ति के सन्दर्भ में स्पष्ट करता है। अगले श्लोक (2.58) में श्रीकृष्ण कछुए के उदाहरण से इन्द्रिय-संयम का वर्णन करते हैं।
जीवन-शिक्षा
प्रेम कीजिए, पर चिपकिए नहीं। अच्छी घटना पर कृतज्ञ रहिए और बुरी घटना पर धैर्य रखिए — दोनों को जीवन के आते-जाते मेहमान मानिए, स्वामी नहीं।
मुख्य शब्द
- अनभिस्नेह
- चिपकने वाली आसक्ति से रहित
- शुभाशुभ
- अनुकूल और प्रतिकूल, अच्छा और बुरा
- अभिनन्दन
- हर्ष से उछलकर स्वागत करना
- प्रतिष्ठित प्रज्ञा
- दृढ़ता से स्थापित विवेक
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.52 – यदा ते मोहकलिलं
- गीता 2.53 – श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा
- गीता 2.54 – अर्जुन उवाच
- गीता 2.55 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 2.56 – दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः
- गीता 2.58 – यदा संहरते चायं
- गीता 2.59 – विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य
- गीता 2.60 – यततो ह्यपि कौन्तेय
- गीता 2.61 – तानि सर्वाणि संयम्य
- गीता 2.62 – ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते